बड़ी खबर: भूस्खलन और भू-धंसाव के बीच जोशीमठ क्षेत्र में लगे भूकंप के झटके, दहशत और आशंकाओं से घिरे लोग
अब आसमानी आफत के साथ ही डराने लगी धरती, मापी गयी 2.8 की तीव्रता
देहरादून। उत्तराखंड में मानसूनी सीजन में पहाड़ों पर भूस्खलन और भू धंसाव के खतरों के बीच चमोली के जोशीमठ क्षेत्र में शनिवार सुबह 10.37 बजे जब धरती डोलने लगी तो लोगों में भारी दहशत देखी गई 2.8 की कम तीव्रता होने के कारण भले ही इस भूकंप से कोई जान माल के नुकसान की खबर नहीं है, किंतु जोशीमठ जो पहले से ही भू धंसाव के कारण मकान में आई मोटी-मोटी दरारों को लेकर खौफजदा हैं, भूकंप के इन झटकों से और अधिक डर गये हैं।
भूकंप का क्षेत्र जोशीमठ से 23 किलोमीटर दूर दक्षिण पश्चिम में बताया गया है। अतिवृष्टि के कारण आपदा की मार झेल रहे चमोली जनपद के जोशीमठ के अस्तित्व पर पहले ही संकट के बादल छाए हुए हैं। जिन दरार युक्त जर्जर घरों में लोग अभी भी रह रहे हैं, उन्हें इस बात का खतरा है कि अगर थोड़ी अधिक तीव्रता का भूकंप यहां आया तो उनका सब कुछ समाप्त हो जाएगा। उधर जोशीमठ क्षेत्र के पंगनो गांव में भूस्खलन की जद में आए पांच-छह मकान के ध्वस्त होने की खबर है। इस गांव के 30-35 परिवार भूस्खलन के कारण खतरे की जद में आ गए हैं, जिन्हें तुरंत विस्थापन की जरूरत है। चमोली में भूस्खलन और भू धसांव के कारण मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग सहित 30 से अधिक सड़कों पर मलबा आने से लोगों को आवागमन में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
उधर, टिहरी झील के आसपास के तमाम गांवों में भू-धंसाव के कारण मकानों में दरारें आने की खबरें आ रही हैं। सर्वे में पता चला है कि अत्यधिक बारिश के कारण टिहरी झील का जलस्तर बढ़ने से इस क्षेत्र में भू-धंसाव हो रहा है। दर्जन भर मकानों पर जमींदोज होने का खतरा मंडरा रहा है, जिन्हें प्रशासन द्वारा खाली करा लिया गया है। भू- धंसाव व भूस्खलन की समस्या से चमोली, पौड़ी के कई क्षेत्र ही नहीं अपितु उत्तरकाशी के धरासू व बड़कोट क्षेत्र में भी बड़ी समस्या बनी हुई है तथा सड़कों का हाल बेहाल है। रुद्रप्रयाग की केदार घाटी भी बुरी तरह से भूस्खलन की चपेट में है और यहां तमाम लैंडस्लाइड जोन बन चुके हैं। कोटद्वार में भारी बारिश के कारण खोह नदी में आए उफान से भारी तबाही का मंजर देखा गया है। मकान व सड़कें सब कुछ ध्वस्त हो गये हैं। मानसूनी आपदा के इस दौर में लोगों को भूस्खलन और भू- धंसाव की घटनाओं ने सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। लेकिन ऐसी स्थिति में पहाड़ की धरती का कांपना लोगों को बड़े खतरे का संकेत लग रहा है, जिसे लेकर वह डरे सहमे हैं।

