झटका: ओबीसी क्रीमी लेयर पर केंद्र की संशोधन याचिका खारिज, वेतन के आधार पर तय नहीं होगी पात्रता

झटका: ओबीसी क्रीमी लेयर पर केंद्र की संशोधन याचिका खारिज, वेतन के आधार पर तय नहीं होगी पात्रता
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सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया अपना पुराना फैसला, माता-पिता के पद और सेवा की स्थिति को बनाया जाएगा
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निर्णय लागू करने के लिए दो साल की मोहलत देने से भी इनकार

नई दिल्ली (आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के क्रीमी लेयर आरक्षण से जुड़े मामले में केंद्र सरकार को झटका देते हुए उसकी संशोधन याचिका खारिज कर दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि ओबीसी क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय माता-पिता की वेतन से होने वाली आय को आधार नहीं बनाया जा सकता। इसके बजाय माता-पिता के पद, सेवा की श्रेणी और सेवा संबंधी स्थिति को ध्यान में रखना होगा। अदालत ने अपने 11 मार्च के फैसले को लागू करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से मांगी गई दो साल की अतिरिक्त मोहलत देने से भी इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिविल सेवा परीक्षा (सीएसई) 2025 का परिणाम 6 मार्च को घोषित हो चुका है, लेकिन अभी तक चयनित अभ्यर्थियों को सेवाओं का आवंटन नहीं किया गया है। ऐसे में फैसले को लागू करने में देरी का कोई ठोस या उचित कारण नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सीएसई 2025 में चयनित ओबीसी अभ्यर्थियों को सेवाओं का आवंटन करते समय क्रीमी लेयर से संबंधित निर्धारित सिद्धांतों की व्याख्या लागू होगी।
केंद्र सरकार ने अदालत से अनुरोध किया था कि 11 मार्च के फैसले को पिछली तारीख से लागू करने के बजाय भविष्य की तारीख से प्रभावी किया जाए। सरकार का तर्क था कि यदि फैसले को वर्ष 2012 से पिछली तारीखों से लागू किया गया तो अब तक हो चुकी नियुक्तियों और कर्मचारियों की वरिष्ठता सूचियों में बदलाव करना पड़ सकता है। इससे ऐसे कर्मचारियों की सेवा संबंधी स्थिति भी प्रभावित हो सकती है, जो इस मुकदमे में पक्षकार तक नहीं हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की इस दलील को स्वीकार नहीं किया और संशोधन याचिका खारिज कर दी। अदालत के फैसले से स्पष्ट हो गया है कि ओबीसी अभ्यर्थियों की पात्रता निर्धारित करने में केवल माता-पिता की वेतन संबंधी आय को आधार नहीं बनाया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को केंद्र सरकार बनाम रोहित नाथन मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया था। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि ओबीसी क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल माता-पिता के वेतन के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए माता-पिता के पद, सेवा की श्रेणी और 8 सितंबर 1993 के सरकारी आदेश में निर्धारित नियमों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
ओबीसी समुदाय के सामाजिक और आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत संपन्न तथा आगे बढ़े हुए वर्ग को क्रीमी लेयर की श्रेणी में रखा जाता है। इस श्रेणी में आने वाले लोगों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है।
इंद्रा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण को वैध ठहराते हुए सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग को आरक्षण के दायरे से बाहर रखने का सिद्धांत स्थापित किया था। वर्तमान व्यवस्था के तहत निर्धारित आय सीमा से अधिक आय वाले ओबीसी परिवारों को सामान्यत: क्रीमी लेयर में रखा जाता है। फिलहाल सालाना आठ लाख रुपये से अधिक आय की सीमा निर्धारित है। हालांकि, क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय संबंधित सरकारी आदेश के तहत माता-पिता के पद और सेवा संबंधी श्रेणी जैसे अन्य मानदंड भी महत्वपूर्ण होते हैं।

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