चिंतन: युवाओं की रगों में दौड़ रहा अपसंस्कृति का जहर

चिंतन: युवाओं की रगों में दौड़ रहा अपसंस्कृति का जहर
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विमल शंकर झा
किसी देश को खत्म करना है तो अब वहां सेकंड वल्र्ड वार के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी की तरह परमाणु एटम बम डालने की जरुरत नहीं है। या रुस  और यूक्रेन युद्ध के बीच विनाशकारीरर मिसाइल और द्रोण के जरिए बड़े बड़े बमों को गिराने की आवश्यकता नहीं है बल्कि उस देश की संस्कृति को खत्म कर दो …। वह मुल्क धीरे धीरे खुद ही मर जाएगा। इन  दिनों हमारे देश भारत में यही हो रहा है। कभी विश्व गुरु कहलाने वाली देश की तहजीब रसातल में जा रही है। पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध, बाजारवाद की चमचमाहट और  दौलत तथा शोहरत की हवस वाली वाली स्टेटस सिंबाल की संस्कृति हमारी पूरब की तहजीब को तेजी से निकल रही है। सीधी सपाट भाषा में कहा जाए तो हमने अंध विकास के लिए विनाश की बीमारी मोल ले ली है। यह यह नया नवेला कल्चर हमारे हजारों साल से चले आ रहे सामाजिक तानेबाने, सांस्कृतिक ढांचे और पारिवारिक संबंधों को तहस-नहस किए जा रहा है। कंटीले कैक्टस के कांक्रीट सघन जंगलों में न्यूक्लीयर फेमिली प्रेम और सम्मान में पगे हमारे संयुक्त परिवार की जड़ों को नेस्तनाबूद कर रहे हैं। एक ओर तो हमारे देश  के सियासी रहनुमा भारत को फिर से विश्व गुरु, सुपर कंम्यूटर और और दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था वाला देश बनाने का दावा या लोकलुभावना सपना दिखा रहे हैं वहीं दूसरी ओर अपने घोषित और अघोषित स्वार्थ के लिए ऐसे दुष्कृत्यों का युद्धस्तर पर चौतरफा अभियान छेड़े हुए हैं। वसुधैव कुटुंबकम की भारत की संस्कृति प्रदूषित हो रही है। आज राजनीतिक शुचिता तार तार हो रही है, सामाजिक, सांस्कृतिक मयार्दा बेजार हो रही है और चौतरफा आर्थिक, सामाजिक विषमता शर्मसार कर रही है। समाज में मानवीय और नैतिक मूल्यों के पतन से बढ़ती अपसंस्कृति, नशाखोरी, अपराध, बलात्कार और भ्रष्टाचार से देश और समाज गर्त में जा रहा है। देश का भविष्य यानी युवा नस्ल कालेजों, यूनिविर्सिटीज और स्कूलों के कैंपस  नाइट क्लबों फार्महाउसों के नीले समंदर में छई-छपाक कर रही है। लिव इन रिलेशन, समलैंगिकता और लेट मैरिज, संतति और सर्जरी का यंगस्टर्स में बढ़ता ट्रैंड समाज को  किस विकास धारा में ले जा रहा है। गर्ल फ्रैंड-ब्याय फ्रैंड और नशे में उन्मत्त युवाओं का आदर्श वाक्य जैसे ये जिंदगी मिले न दोबारा और अपना सपना मनी मनी हो गया है।  एक सर्वे के मुताबिक देश में 70 फीसदी लोग किसी न किसी तरह का नशा कर रहे हैं। इनमें 28 प्रतशित लड़कियां और महिलाएं मदिरा से लेकर ब्राउन शुगर वाला उड़ता पंजाब जैसा नशा कर रही हैं। यदि देश की 37 प्रतिशत जनसंख्या वाले युवा की ऐसी रुग्ण सोच हो तो भला विश्व गुरु का सपना कैसे पूरा होगा। छोटे मियां तो छोटे मियां बड़े मियां शुबहान अल्ला की तर्ज पर युवा क्या अधेड़वय क्लास भी यह सकल कर्म कर रहा है। इनमें सुसभ्य व सुंस्कृत माने जाने वाला तथा अनपढ़ों को गंवारु और जाहिल बोलने वाला पढ़े लिखों का तबका भी इन व्याधियों के मामले में युवाओं का पथप्रदर्शक बना हुआ है। आड़े,तिरछे और शार्ट कट रास्ते से वन टू का फोर कर भ्रष्टाचार और अनाचार के लिए शिष्टाचार के  चिथड़े उड़ाना आज हमारी संस्कति की पहचान बनती जा रही है। घोर आश्चर्य की बात है कि भ्रष्टाचार और मांड कल्चर से अपने स्टेटस सिंबाल को चमकाने वाला यह तबका विश्वगुरु,वसुधैव कुटुंबमक और सत्यमेव जयते की हमारी संस्कति को किताबी व लफ्फाजी बताते हुए आज न तो इस विषय में कुछ बात करना चाहता है और न कुछ सुनना चाहता है। मु्ट्ठीभर बचे शरीफ और ईमानदारों को बेवकूफ, बाबा  आदम और गांधी की औलाद जैसे लफ्जों से नवाज कर मखौल उड़ाया जाता है। नैतिकता के  धरातल के रसातल में जाने में हमारी सियासी कौम सबसे अधिक जिम्मेदार है। समाज यदि भटक रहा है तो इसके नेपथ्य में पहुंचाने के लिए हमारे राजनैतिक कर्णधार कम जिम्मेदार नहीं है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के नाते कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिक को संचालित करने वाली सियासी पार्टियां यानी सरकारों  का राजनीतिक व नैतिक शुचितावान होना जरुरी है। लेकिन क्या नब्बे के दशक से आज तक आर्थिक उदारीकरण से लेकर निजीकरण के इस दौर तक सरकारें ईमानधरम को तवज्जो देती हैं। एक पार्टी मदिरा की होम डिलेवरी करवाती है तो दूसरी अंग्रेजी शराब को सस्ता करने की घोषणा करने को सुशासन बताती है। आज पढ़ा लिखा डिग्री डिप्लोमा धारी और अल्प शिक्षित युवा  दिहाड़ी मजदूर बनकर  सियासी दलों के पचरम बैनर थामकर नारे लगाने को मजबूर है। आखिर देश व  समाज की तस्वीर व तकदीर कब बदेलगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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