पहल: पर्यावरण और विकास के मुद्दे पर सामुहिक चिंतन को जुटे बुद्धिजीवी

पहल: पर्यावरण और विकास के मुद्दे पर सामुहिक चिंतन को जुटे बुद्धिजीवी
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समाज के बेहतरीन भविष्य की रूपरेखा पर भी हुआ विमर्श

अनन्त आकाश
देहरादून। पीपल्स प्रोग्रेसिव क्लब द्वारा ‘उत्तराखंड में कटते जंगल, विकास या विनाश’ विषय पर शहर में एक परिचर्चा आयोजित की गई। प्रदेश के सामाजिक सरोकारों और सकारात्मक विकास के मुद्दे पर चिंतन की पहल करते हुए वक्ताओं ने बेहतरीन भविष्य के निर्माण के लिए गंभीर प्रयासों की आवश्यकता बताई।

राजधानी में रविवार को आयोजित यह परिचर्चा वास्तव में एक सकारात्मक पहल थी ,जो निश्चित तौर पर पर्यावरण पर सभी समान विचारधारा के लोगों को एक स्थान पर एकत्र करने में कामयाब रही। परिचर्चा में समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े पर्यावरणविदों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं जिनका स्वयं में अपना कार्य एवं अनुभव है,उन सभी ने अपने अपने विचार एवं अनुभव अपने अपने तरीकों से उपस्थित लोगों के समक्ष रखे। किन्तु सभी की चिन्ता इस बात पर केंद्रित रही कि समाज का बेहतरीन भविष्य कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है। परिचर्चा में उन सरकारी पर्यावरणविदों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं से सतर्क रहने को कहा गया, जो समाज को नुकसान पहुंचा रहे हैं ।
कुल मिलाकर परिचर्चा में मुख्य लक्ष्य पर्यावरण पर असर करने वाले नीतिगत तत्त्वों की चर्चा करना था।
परिचर्चा में वक्ताओं का कहना था कि हमें ऐसे विकास की जरूरत नहीं है जिसकी कीमत आमजन को अपनी जान देकर चुकानी पड़े। पर्यावरण के नुक़सान का असर सबसे अधिक गरीब वर्ग पर पड़ता है। वक्ताओं ने पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से उत्तराखंड में विकास के नाम पर हो रहे विनाश को अपने जमीनी स्तर के अध्ययन के साथ सबके सामने प्रस्तुत किया। परिचर्चा में सरकार की चार धामों को पर्यटन केंद्र बनाने की सोच पर प्रहार करते हुए कहा कि सरकार धामों को दामों से बेचने का प्रयास कर रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसा प्रयास विकास नहीं, आम लोगों से जुड़े संसाधनों के ऊपर डाका है। परिचर्चा में कहा गया कि विकास के नाम पर बन रही योजनाएं अलोकतांत्रिक तरीके से तैयार की जा रही है जिसमें आम जनता की कोई भागीदारी नहीं है। लोकतंत्र में सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ रहा है और योजनाएं सीधे दिल्ली से बनकर तैयार हो रही हैं। परिचर्चा में युवाओं से आह्वान किया गया कि बेहतर भविष्य के लिए और योजनाएं आमजनों के हित से जुड़ी हो। इसके लिए आवश्यक है कि सत्ता का विकेंद्रीकरण हो और इसके लिए जनता को अपने अपने प्रतिनिधियों के घर के बाहर जाकर प्रदर्शन और संघर्ष करना होगा। साथ ही कहा कि समाज को विकास भी चाहिए और पर्यावरण भी चाहिए।
परिचर्चा में यह आम राय थी कि पर्यावरण की रक्षा की बात करना विकास विरोधी होना नहीं है। निश्चित तौर पर राज्य की जनता को सड़क, बिजली व अन्य सुविधाएं मिलनी चाहिए, मग़र उसकी कीमत लाखों पेड़, सैकड़ों-हज़ारों गांवों की खेती-किसानी, उनकी जमीनों और सभी के सामुहिक भविष्य की आहुति नहीं हो सकती है। विकास के सभी कार्यों को वैज्ञानिक तरीके से योजनाबद्व और कार्यान्वित किया जाना चाहिए जिससे राज्य की जनता के जन-जीवन और पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो। इसके लिए उन्होंने कहा कि विकास के स्वरूप को समझा जाना चाहिए, लेकिन जिस तरह का विकास का मॉडल आज की सरकारें पेश कर रहीं है यह पूंजीवादी मॉडल है जिसका मकसद अधिक से अधिक प्राकृतिक सम्पदा का दोहन करके ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना हो गया है, जो सरासर अन्याय है।
परिचर्चा में कहा गया कि पर्यावरण पर जो हमला है, वह देश के संघीय ढांचे पर भी हमला है और साथ ही जनतांत्रिक प्रणाली पर भी हमला है । उदाहरण के तौर पर केदारनाथ के फाटा ब्लॉक के अंदर सड़क निर्माण के तहत विस्फोटक पदार्थों के इस्तेमाल की बात कही गई, जिसके कारण सैकड़ों घरों में दरार आयी है और कई मेट्रिक टन मलवा मंदाकिनी नदी में गिराया गया है। साथ ही उन्होंने जंगलों के कटने से खेती किसानी को हो रहे नुकसान की बात भी की। वक्ताओं का कहना था कि विकास की जो प्रक्रिया सरकार द्वारा अपनाई जा रही है उसमें जनभागीदारी नहीं है, पेड़ों के काटने के लिए ग्राम पंचायत को शामिल नहीं किया जा रहा है। साथ ही उन्होंने पर्यावरण की चिंता पर सरकारों द्वारा ध्यान ना दिए जाने के लिए नौजवानों, किसानों, मजदूरों के सयुंक्त संघर्ष के आह्वान की बात की।
परिचर्चा में बड़ी संख्या में राज्य भर से श्रोता उपस्थित रहे जिसका बड़ा हिस्सा युवाओं का था जो कि इस बात को दर्शाता है कि राज्य का युवा पर्यावरण की रक्षा और विकास के विनाशकारी मॉडल के कितने खिलाफ है। परिचर्चा का समापन करते हुए इस बात पर सभी एकजुट थे कि आने वाले समय में युवाओं को सत्ता के खिलाफ जागरूक किया जाएगा ताकि सरकारें कोई भी कार्य करने से पहले आम जनजीवन और पर्यावरण को ध्यान में रखें।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ताओं में डा हेमंत ध्यानी ,पर्यावरणविद रवि चोपड़ा ,हिमान्शु अरोड़ा ,प्रोफेसर एस पी सती ,किसान नेता गंगाधर नौटियाल आदि थे ।कार्यक्रम का संयोजन पीयुष शर्मा ने किया ।

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