श्रापित गर्भ: ऐसे भी अभागे हैं जिनकी मौत पर आंसू नहीं बहाए जाते हैं

श्रापित गर्भ: ऐसे भी अभागे हैं जिनकी मौत पर आंसू नहीं बहाए जाते हैं
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अभिलाषा श्रीवास्तव
क्सर घरों में किसी के निधन के बाद उसकी पुण्यतिथि मनाई जाती हैं और सामर्थ्य अनुसार दान-पुण्य किया जाता हैं ताकि आत्मा को शांति मिले।
मगर हर तबके में एक मृत्यु के बाद ना तो पुण्यतिथि मनाई जाती है न ही आंसू बहाए जाते हैं
और ना ही दान पुण्य होता है, क्योंकि मृतक माँ के कोख में ही दम तोड़ देती है।
बात कड़वी है लेकिन 100 प्रतिशत सही है।
जी हाँ, मैं बात कर रहीं हूँ माँ के उस गर्भ की जो पुत्र मोह के लिए पुत्री की हत्या से रंग जाते हैं।
कहते है कंस अपनी बहन के बच्चों की हत्या जन्म के बाद कारागार में करता रहा क्योंकि उसे डर था अपने प्राणों का,मगर माँ के गर्भ गृह में मारने वाला कंस कौन हैं ?
वह भी अपने अबोध अंश का ? उसे किसी का डर नहीं। बस  पुत्र रत्न प्राप्ति की अभिलाषा, और यहीं से शुरू होने लगता है पाप-पुण्य का वह खेल, जो  मानव रूपी माता -पिता से वह अपराध करवाने लगता है जो ना चाह कर भी वे कर बेठते हैं।
खैर मेरा काम था लिखना…क्योंकि गीता -कुरान बाकी धार्मिक किताबों में केवल लिखा गया है बाकी तो सभी समझदार हैं ही।
अपने आंगन के नन्ही दूब को फैलने दें
कोई फर्क नहीं पड़ता समाज को कि आपके घर बेटा हुआ है या बेटी ?
उन्हें अपने हाथों से कुचलने की चेष्टा ना करें। सृष्टि है तभी शिव हैं वरना पत्थरों पे फूल नहीं खिलते।
अजन्मे भ्रूण की हत्या व्यक्तिगत सोच है, मजबूरी नहीं
फिर खुद के हाथों अपनी ही उस कली को कोई कैसे कुचल सकता है ? जिसके अंदर हमारा रक्त बह रहा हो यहां तक कि धड़कन भी साथ साथ धड़क रही हो और वह नन्ही सी जान हाथों में आने के लिए पल- पल प्रतिक्षा कर रही हो !
माँ तो मिट्टी से बनी हुई दुर्गा की वह प्रतिमा होती है जिसका स्वभाव ही मातृत्व की रक्षा करना है, फिर वह अपनी कोख की रक्षा करने में असर्मथ कैसे हो सकती है ,क्योंकि पुरुष के साथ साथ वंश की चाहत स्त्री के मन में भी प्रंचड वेग से हावी होती है।और अंधकार में छोटा सा पवित्र दिया अपना अस्तित्व  खो देता है।
अगर स्त्री स्वयं के भ्रूण हत्या को हत्या होने से नहीं बचा सकती तो फिर उसे माँ कहलाने का हक कैसे?
माँ तो जननी होतीं है, उसके लिए पुत्र और पुत्री में क्या भेद ?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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