मुद्दा: इस बदलाव में महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधरने की कोई संभावना नहीं दिखाई देती

मुद्दा: इस बदलाव में महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधरने की कोई संभावना नहीं दिखाई देती
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नरेंद्र मोदी सरकार ने रोजगार की समझ बदलने की औपचारिक पहल कर दी है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय जनवरी 2027 से अपने आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) में यह बदलाव लागू करेगा। इसके तहत गिग और प्लेटफॉर्म को कर्मियों तथा घरेलू काम में अवैतनिक योगदान करने वाली महिलाओं को रोजगारशुदा गिना जाएगा। इस परिवर्तन के पक्ष में तर्क है कि जोमैटो, स्विगी, ओला, अर्बन कंपनी आदि जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर लाखों लोग काम कर रहे हैं। नए सर्वे से उनकी संख्या मालूम होगी। पता चलेगा कि वे कितने घंटे काम करते हैं। इसी तरह कारोबार में महिलाओं के योगदान को भी मान्यता मिलेगी। इसका एक और परिणाम होगा कि पीएलएफएस के आंकड़ों में श्रम बल में मौजूद लोगों और रोजगारशुदा लोगों की संख्या बढ़ी हुई दिखेगी।
‘विकास का कथानक’ लिखने के लिहाज से ये आंकड़े काम के साबित होंगे! लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या उन आंकड़ों से संबंधित कर्मियों के हालात बदलेंगे? गिग वर्कर्स को प्लैटफॉर्म कंपनियां ‘कर्मचारी’ नहीं, बल्कि ‘स्वतंत्र ठेकदार’ मानती हैं। इसलिए उन्हें ना न्यूनतम वेतन की गारंटी मिलती है, ना स्वास्थ्य बीमा, और ना ही पेंशन। सरकार के सोशल सिक्योरिटी कोड के तहत अपेक्षित सुविधाएं शायद ही कहीं धरातल पर अमल में आई हैँ। ऐसे में सर्वे अगर केवल उनकी गिनती करता है और उन्हें सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने का कानूनी ढांचा तैयार नहीं होता, तो इस डेटा संग्रह का लाभ संदिग्ध ही रहेगा। महिलाएं रोज अपने कई घंटे बच्चों-बुजुर्गों की देखभाल, और घरेलू कार्यों में बिना किसी वित्तीय मुआवजे के लगाती हैं।
बहरहाल, नए सर्वे में उनके अवैतनिक श्रम को दर्ज करने का प्रतीकात्मक महत्त्व चाहे जो हो, उससे महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधरने की कोई संभावना नहीं बनेगी। जब तक बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल का मजबूत सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे क्रेच और केयर सेंटर्स) तैयार नहीं होता, अवैतनिक कार्य का बोझ महिलाओं के कंधों से नहीं हट पाएगा। इसलिए असल चुनौती आंकड़े इकट्ठा करने की नहीं, बल्कि श्रम कानूनों में गिग कर्मियों के अनुकूल संशोधन और महिलाओं को आर्थिक संबल देने की योजनाओं को लागू करने की है। इस मामले में सरकार चुप है!

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