मुद्दा: अब संवेदनहीनता हमारे समाज की एक बड़ी पहचान बन चुकी है

मुद्दा: अब संवेदनहीनता हमारे समाज की एक बड़ी पहचान बन चुकी है
Spread the love

 

हरिशंकर व्यास
हां, देश के अंदर व्यवस्थित तरीके से दो देश बनाए गए हैं। एक आम आदमी का देश है और दूसरा वीआईपी का है या पैसे वालों के लिए है। सोचें, देश के बड़े मंदिरों में आधिकारिक रूप से वीआईपी दर्शन की सुविधा होती है। आम आदमी जहां 12-12 घंटे लाइन में खड़ा रहता है वही वीआईपी को चुटकियों में दर्शन कराया जाता है। इतना ही नहीं शीघ्र दर्शनम की भी व्यवस्था है। पांच सौ या हजार रुपए की टिकट कटा कर आम लोगों यानी कैटल क्लास से अलग लाइन में लग कर दर्शन किया जा सकता है। लेकिन अगर कई व्यक्ति इसे दो भारत बता कर सवाल उठाए तो देश विरोधी और हिंदू विरोधी कहा जाता है।
असल में मीडिया और सरकार के नैरेटिव में सिर्फ गुलाबी तस्वीर दिखाई जाती है। उसी आधार पर दावा किया जाता है कि भारत में समृद्धि आ रही है। असल में ऐसा नहीं है। भारत की प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है तो वह 10 फीसदी लोगों की बढ़ रही है। प्रति व्यक्ति उपभोग बढ़ रहा है तो वह 10 फीसदी लोगों का बढ़ रहा है। महंगे फोन, लक्जरी ब्रांड की वस्तुएं और गाड़ियां बिक रही हैं तो खरीदार वही 10 फीसदी का वर्ग है। अगर इनकी चमक दमक ही हर जगह दिखाई जाएगी तो असली भारत की तस्वीर कभी भी सामने नहीं आएगी।
तभी सरकार के विज्ञापनों में या मीडिया में किसान जैसा दिखाया जाता है, असल में भारत का किसान वैसा नहीं है। जैसी महिला दिखाई जाती है, असल में महिलाएं वैसी नहीं हैं। जैसा युवा दिखाया जाता है वह भी वैसा नहीं है। जो असलियत में है उसकी तस्वीर सामने नहीं आती है। कभी कभार अगर असली तस्वीर सामने आ जाती है तो वह भी ज्यादा समय तक लोगों की मेमोरी में टिकती नहीं है क्योंकि संवेदनहीनता भी इस समाज की अब एक बड़ी पहचान है

Parvatanchal