पेरिस कम्यून: जब दुनिया में कुछ समय के लिये मजदूरों का राज आया
अनंत आकाश
18 मार्च 1871 को फ्रांस के पेरिस में मजदूरों का राज स्थापित हुआ था, जिसे पेरिस कम्यून के नाम से जाना जाता है। यह दुनिया में मजदूरों की पहली सत्ता थी। हालांकि यह राज्य लगभग ढाई महीने ही चल पाया, किंतु इसका इतिहास सदियों पुराना है। इतिहास की परिणति आज भी निरंतरता की ओर है।पूंजीवादी, सामंती व्यवस्था जो इसे पसंद नहीं करती थी, उसने इस क्रांति में हिस्सा लेने वाले मजदूर – नौजवानों, बुजुर्गों, औरतों व बच्चों की निर्मम हत्याऐं कर डालीं। वे नहीं चाहते थे कि वे उनकी गुलामी से मुक्त हों। अपुष्ट आंकड़ों के अनुसार, मजदूरों के राज के खात्मे के लिए कम्यून की स्थापना में शरीक 20,000 मजदूरों को दीवारों के सामने खड़ा कर के गोलियों से भून डाला गया तथा लगभग 7,500 देश से निर्वासित कर दिये गये। इन सभी को फ्रांसीसी उपनिवेशों में भेजकर तरह तरह से प्रताड़ित कर मार दिया गया। इसी प्रकार पूरे फ्रांस में इस आंदोलन में शरीक मजदूरों की ढूंढ़-ढूंढ़ कर हत्याएं की गईं। इनमें से कुछ आंदोलनकारी यूरोप के अन्य देशों में भागने में सफल हुए, उसके बावजूद वहाँ भी वे प्रताड़ना से बच नहीं पाये। उन्हें रोजगार नहीं दिया गया। शक के आधार पर जेल के शिंकजों में कैद किया गया।

पेरिस कम्यून के खात्मे के बाद पूरे यूरोप में कत्लेआम का सिलसिला जारी रहा, क्योंकि पेरिस कम्यून में शामिल मजदूरों को एकजुट करने वाली संस्था इंटरनेशनल वर्किंग मेंस एसोसिएशन को प्रतिबंधित करना, प्रताड़ित करना तथा इस संस्था की इकाइयों को जबरन भंग करना, संस्था में पुलिसिया घुसपैठ करवाकर आतंकवादी गतिविधियों के जाली ‘प्रमाण’ रखवाकर फर्जी मामलों को आधार बनाकर इनके कार्यकर्ताओं को जेल में डालना शामिल था ।
इस तरह कहा जा सकता है कि पेरिस कम्यून के खात्मे के बाद कत्लेआम का असली मकसद वैचारिक रूप से खात्मे का था तथा वास्तविक था, ताकि इतिहास को भविष्य की पीढ़ियों तक न पहुंचाया जा सके। मजदूरों की सत्ता पेरिस कम्यून का असली मकसद था कि रोज रोज की जिंदगी, जो अभाव ग्रस्तता के साथ अमानवीय शोषण तथा मेहनत के मुकाबले सामंती, पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा शोषण, अनाचार एवं अत्याचार का अंतहीन सिलेसिले से मुक्त था। पेरिस का वह मजदूर वर्ग चाहता था कि उसे शांति एवं प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने का मौका मिल सके, किंतु सामंती एवं पूंजीवादी शोषक व्यवस्था को यह कभी मंजूर नहीं था, क्योंकि उनकी चकाचौंध का आधार ही मेहनतकशों का शोषण था, जो कि आज तक बदस्तूर जारी है।

दूसरी तरफ, मजदूर वर्ग की मुक्ति की लड़ाई भी बदस्तूर जारी रही। उसने पेरिस कम्यून के बाद दुनियाभर में अपने हितों की अनेक सत्ताएं स्थापित की हैं, जिससे उसकी स्थिति में काफी कुछ सुधार हुआ है, किंतु प्रतिगामी ताकतों द्वारा अपनी लूटखसोट जारी रखने के लिये धर्म,जाति तथा पैसों का खेल अब भी जारी है। ठीक इसके विपरीत मजदूर वर्ग भी अपने अधिकारों के लिये सतत संघर्ष में चौबीसों घंटे लगा हुआ है। इसलिए पेरिस के मजदूरों ने जो लड़ाई आज ही के दिन 18 मार्च 1871 में जीती थी,वह पेरिस कम्यून के पतन के बावजूद बदस्तूर जारी है और तब तक जारी रहेगी जब तक आदमी द्वारा आदमी का शोषण का अंत इस दुनिया से नहीं हो जाता और जब तक ऐसी व्यवस्था की स्थापना न हो जाए, जहाँ समाज के शोषित हिस्से को सदियों से सामंती तथा पूंजीवादी व्यवस्था की नस्लवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता तथा आर्थिक रूप से गुलाम करने की निर्मम व्यवस्था का अंत नहीं हो जाता। यही पेरिस कम्यून में में मारे गये शहीद मेहनतकशों को सच्ची श्रृद्धांजलि होगी !
इंकलाब जिन्दाबाद !

