पक्ष-विपक्ष: सोशल मीडिया को लेकर क्या-क्या सोचते हैं लोग? यहां पढ़िए दो अलग-अलग टिप्पणियां…

पक्ष-विपक्ष: सोशल मीडिया को लेकर क्या-क्या सोचते हैं लोग? यहां पढ़िए दो अलग-अलग टिप्पणियां…
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अब निजी ब्रांड गढ़ रहा सोशल मीडिया
सोशल मीडिया के अब कई सकारात्मक रूप सामने आ रहे हैं। मगर इसमें किसी भी प्रोडक्ट, सर्विस या पर्सनल ब्रांड को बनाना पेड़ लगाने या बच्चे को पालने जैसा काम है। यह एक दिन में नहीं बनता। इसको बनाने के लिए लगातार प्रयास चाहिए। प्रोडक्ट या सर्विस ब्रांड के बारे में तो सब जानते हैं, लेकिन यह पर्सनल ब्रांड क्या है? तो इसे यूं समझिए कि टाटा नमक एक प्रोडक्ट ब्रांड है, टाटा स्काई सर्विस ब्रांड और स्वयं रतन टाटा एक पर्सनल ब्रांड हैं। जैसे बहुत लोग मुझे इन्सेन्स मीडिया के नाम से जानते हैं और इन्सेन्स को मुझसे। ज्यादातर लोग पर्सनल ब्रांड को बिल्कुल आगे नहीं रखते और सिर्फ बिजनेस ब्रांड पर फोकस करते हैं। मगर आपका पर्सनल ब्रांड आपके बिजनेस को बहुत फायदा पहुंचा सकता है। गौर कीजिए, आज ब्रांड नरेंद्र मोदी से पूरी भाजपा की नैया पार लग रही है। इसी तरह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपना अलग पर्सनल ब्रांड बनाया है।
कल मैं अहमदाबाद में था, एक मित्र ने कहा कि मैं एक सोशल मीडिया एजेंसी हायर कर रहा हूं अपने अगरबत्ती ब्रांड के प्रमोशन के लिए। मैंने पूछा, अच्छी बात है, लेकिन आपके ब्रांड को प्रमोट कैसे करना है, एजेंसी को आप कैसे समझाओगे? उन्होंने कहा, यह तो उसका (एजेंसी का) काम है, अपने आप करेगी। मैंने कहा, अपने बच्चे की परवरिश आया के हाथों करानी है या उसे खुद संभालना है, यह पूरी तरह से निजी और परिस्थितिजन्य मामला है। संभव है, आपके पास बिल्कुल समय न हो और आया ही आपके बच्चे को संभाले, लेकिन आया की परवरिश और आपकी परवरिश के आउटपुट में अंतर होगा।
लोग आपकी छोटी-छोटी गतिविधियों को मॉनिटर करते हैं। आपको महीनों-सालों तक ऑब्जर्व करते हैं, फिर आपके बारे में एक धारणा बनाते हैं, यह धारणा ही आपका पर्सनल ब्रांड है। आपको लगेगा कि कोई नोटिस नहीं कर रहा, लेकिन लोग आपके सोशल मीडिया अकाउंट को स्क्रॉल करते हैं, बगैर कोई प्रतिक्रिया दिए। फिर एक दिन वे आपसे कहेंगे, आपकी दो साल पहले की गई वह पोस्ट पढ़ी थी, तभी से आपके साथ जुड़ना चाहता था।
भारत में 140 करोड़ पर्सनल ब्रांड हैं। सवाल है, कौन इसे कैसे ‘कैरी’ करता है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ उद्योगपति, खिलाड़ी या अभिनेता-नेता ही पर्सनल ब्रांड हैं, आप अगर नौकरी भी करते हैं, तब भी आप एक पर्सनल ब्रांड हैं। एक से दूसरी संस्था में जाने पर वह संस्था आपके साथ नहीं जाती, आपका पर्सनल ब्रांड साथ जाता है। इसलिए अपने पर्सनल ब्रांड में निवेश कीजिए, यह अच्छा इन्वेस्टमेंट है। सोशल मीडिया तेजी से ऐसे ब्रांड गढ़ रहा है।
-दीपक गोयल, टिप्पणीकार

 

सिर्फ छवि ध्वस्त करने का यह माध्यम
सोशल मीडिया आज के युग की एक बड़ी सच्चाई है। मगर कई मामलों में यह खतरनाक दानव साबित हो रहा है। अभी तक यह किसी जिम्मेदार तंत्र के नियंत्रण में नहीं है, ताकि इस पर पोस्ट की जाने वाली सामग्रियों की प्रामाणिकता की जवाबदेही तय की जा सके। किसी पोस्ट के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मामला बनने पर ही सरकारी या गैर-सरकारी हस्तक्षेप से संबंधित सामग्री का नियमन होता है, वह भी नाममात्र का। और जब तक नियमन की प्रक्रिया पूरी हो पाती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। पोस्ट करने वाला अपने मूल उद्देश्य में, यानी आपकी छवि ध्वस्त करने के इरादे में सफल हो चुका होता है। सोशल मीडिया पर अक्सर भ्रामक जानकारियां पोस्ट की जाती हैं। अगर आप उन पर भरोसा करते हैं या उनको साझा करते हैं, तो आपकी छवि को गहरा धक्का लग सकता है। इस माध्यम के सबसे बड़े खलनायक हैकर्स हैं, जो आपकी निजी जानकारियों या संदेशों तक पहुंच जाते हैं।
सोशल मीडिया का बहुत ज्यादा उपयोग अवसाद, तनाव जैसी स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है। इसके विभिन्न मंचों पर अक्सर ऐसी तस्वीरें चर्चा बटोरती हैं, जो वास्तविक नहीं होतीं। इन तस्वीरों के देखकर आप संबंधित व्यक्ति के बारे में गलत धारणा बना सकते हैं। इस पर लोग अक्सर दूसरों की तुलना में अपने जीवन को खुशहाल दिखाने की कोशिश करते हैं। इससे आप कुंठा के शिकार हो सकते हैं। आजकल मेट्रो में आप देखें, हर यात्री अपने मोबाइल में फेसबुक, इंस्टाग्राम या वाट्सएप ग्रुप में डूबा मिलेगा। कोई किसी से संवाद करता हुआ कम दिखता है। इस तरह ये मंच दिन-ब-दिन आपको दूसरों से काट रहे हैं। ऐसे में, आपमें अकेलापन और अलगाव की भावनाएं मजबूत हो सकती हैं, जिनसे आपको नुकसान ही होगा। सोशल मीडिया पर यदि आपने गलत जानकारी साझा की या कोई फर्जी वीडियो या फोटो पोस्ट की, तो बेमतलब कानूनी पचड़े में फंस सकते हैं।
सोशल मीडिया युवाओं के लिए अविश्वसनीय रूप से हानिकारक साबित हो रहा है। पश्चिम में कई शोध इसका खुलासा कर चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया समेत कई देश इसके नियमन के ठोस कानून बना रहे हैं। बच्चों का स्क्रीन पर ज्यादा समय न सिर्फ उनकी आंखों को प्रभावित कर रहा, बल्कि उन्हें उन व्यावहारिक ज्ञान से दूर कर रहा, जो जिंदगी भर काम आते हैं। इसीलिए यह जरूरी है कि सोशल मीडिया से पर्याप्त दूरी बरती जाए। हमें लोगों को सोशल मीडिया की सीमाएं बताने, इसके उपयोग का मॉडल बनाने और बच्चों को इसका सुरक्षित उपयोग सिखाने के लिए मिलकर काम करने की जरूरत है।
-निरंजन दास, टिप्पणीकार

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