नज़रिया: अपने तौर-तरीकों के लिहाज़ से जंतर-मंतर का आक्रोश सचमुच नई पीढ़ी का आंदोलन था
हरिशंकर व्यास
नीट यूजी पेपर लीक के खिलाफ जंतर मंतर का आंदोलन सचमुच नई पीढ़ी का आंदोलन था। सिर्फ इस लिहाज से नहीं कि नई पीढ़ी के लोग इसमें शामिल हुए। वह एक पहलू है कि वयस्क होने से पहले की उम्र वाले किशोर और युवा इस आंदोलन का हिस्सा बने। इस लिहाज से भी यह नई पीढ़ी का आंदोलन था कि इसमें नए साधनों और नए माध्यमों का खुल कर इस्तेमाल हुआ। छात्र और युवा सोशल मीडिया के जरिए अपना नैरेटिव बना रहे थे। उनकी रचनात्मकता देखने वाली थी। वे पारंपरिक मीडिया या पुराने व स्थापित सोशल मीडिया हैंडल्स के भरोसे नहीं रहे। वे अपना कंटेंट तैयार करते रहे और उसे प्रचारित करते रहे।
तभी उनके ऊपर इस बात का असर नहीं पड़ा कि मीडिया या सोशल मीडिया इसको कैसे दिखाता है और सरकार किस तरह से इसकी साख बिगाड़ने का प्रयास करती है। वह प्रयास होता रहा लेकिन उस पर भारी युवाओं का अपना कंटेंट था। उन्होंने बहुत प्रभावी तरीके से सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया।
इसी तरह ऐप बेस्ड सेवाओं का इस्तेमाल जैसा इस आंदोलन में हुआ वैसा पहले कभी नहीं हुआ। वैसे भी नए समय का पहला बड़ा आंदोलन था। तभी कई दिन तक नई दिल्ली के आसपास के सारे मेट्रो स्टेशन बंद रहने पर भी छात्रों को परेशानी नहीं हुई। उन्होंने सबके रास्ते निकाले। ऐप बेस्ड कैब सेवाएं हों या ऐप बेस्ड फूड डिलीवरी की सेवा हो, जंतर मंतर पर सबका इस्तेमाल हुआ।
इसी तरह आंदोलनकारी अपने नारों और कंटेंट में भी बहुत अलग थे। वे पुराने नारों से अपनी लड़ाई नहीं लड़ रहे थे। बहुत लोगों को बुरा लगा है और वे पुराने जमाने के नारे लिख कर बता रहे हैं कि पहले कितना सारगर्भित और साफ सुथरा नारा हुआ करता था। यह भी कहा जा रहा है कि युवाओं के नारे अश्लील थे और इससे उनका आंदोलन प्रभावित हो रहा था। लेकिन इस तरह की बातों से युवाओं पर कोई असर नहीं पड़ा । वे बिना किसी शर्मिंदगी या बिना किसी माफीनामे के अपनी बात कहते रहे । पहली बार सरकार और भाजपा के पूरे इकोसिस्टम को लगा कि छात्रों व युवाओं के जिस समूह के साथ प्रधानमंत्री परीक्षा पर चर्चा करते थे या जिनके लिए एग्जाम वारियर्स नाम से किताब लिखी है वे नाराज होते हैं तो क्या कर सकते हैं? अब तक सरकार ने उनका सद्भाव देखा था लेकिन अब उन्होंने नाराजगी दिखाई दी। सद्भाव और समर्थन दिखाने का उनका तरीका भी वैसा था, जैसे विरोध दिखाने का । पहले वे इस तरह की बातों का इस्तेमाल विपक्षी पार्टियों के लिए करते थे, तब सरकार और भाजपा के इकोसिस्टम को यह सब अच्छा लगता था। लेकिन जब उन्हीं की दवाई से उनका इलाज होने लगा तो बुरा लगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

