नज़रिया: उत्तराखंंड को बचाना सबकी नैतिक जिम्मेदारी
पहाड़ बचाने के लिए सत्ता परिवर्तन आवश्यक हो गया है, परंतु परिवर्तन का मतलब यह नहीं कि नहले दहले लाकर ही परिवर्तन हो। अब युवाओं, महिलाओं और उत्तराखंड की आम जनता को समझना होगा कि आज तक कान सीधे पकड़ा या हाथ घुमाकर, फिर भी कान तो वही हैं।
सबको खासकर युवाओं को राजनीति में बेवकूफ बनाते देखा है परंतु कितने युवाओं को मौका मिला ? हाँ राजनीति में ये कुर्सी चिपकू हमेशा 55- से 70- पार उम्र पर भी युवा बने हुए हैं।
धनबल के कारण भीड़ जुटाकर, गाड़ियों का लावलश्कर लेकर चलने वाले नेता, कभी किसी गाँव में अकेले भ्रमण करने की स्थिति में क्यों नहीं हैं? क्या जनता सोच रही है ? सीधी सी बात है यदि कुर्सी चिपकू नेताओं ने त्वरित गति से जनता की समस्या का समाधान किया होता तो बेझिझक किसी भी गली किसी भी गाँव में अकेले देखे जा सकते। फिर डर भी बहुत होता है। नेताओं के अंदर एक भय हमेशा रहता है जनता का। जनता ही तो है जो माटी के बरतन की तरह न जाने कब किसको मरोड़ कर चित कर दे राजनीति की पारी मे! आज़ उत्तराखंड में विपक्ष को खत्म किया जा रहा है सबको अपने में समाकर। तो जागो उत्तराखंंडियो, अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करो। आखिर, हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी भी है इस उत्तराखंड के लिए।
(उर्मिला महर सिलकोटी-दीदी की कलम से)

