दुष्प्रभाव: मौसम की मार ने तोड़ी सेब काश्तकारों की उम्मीदें, सरकार से की राहत देने की मांग
उत्तरकाशी। रवांई घाटी में इस वर्ष मौसम की बेरुखी ने सेब काश्तकारों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। पहले सूखे और बर्फबारी की कमी ने फसल को प्रभावित किया। वहीं बाद में हुई ओलावृष्टि और लगातार बारिश ने उम्मीदें भी तोड़ दी। सेब के दानों पर पड़े ओलों के गहरे निशानों के कारण काश्तकारों को अच्छे दाम मिलने की संभावना भी धूमिल हो गई है। इस वर्ष सेब के बगीचों में पर्याप्त बर्फबारी नहीं हुई जिससे चिलिंग आवर्स की कमी बनी रही। अप्रैल में फ्लावरिंग का पीक समय होता है जब मधुमक्खियां परागण कर बेहतर उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है लेकिन इसी दौरान हुई बारिश और ओलावृष्टि से परागण धुल गया और बड़ी संख्या में फूल झड़ गए। रवांई घाटी के नौगांव, पुरोला और मोरी ब्लॉक में हर वर्ष करीब 25 हजार मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है। यहां सैकड़ों परिवारों की आजीविका पूरी तरह सेब की खेती पर निर्भर है लेकिन इस बार मौसम की मार से काश्तकारों के लिए बगीचों में खाद, दवाई और रखरखाव पर सालभर किए गए खर्च की भरपाई करना भी मुश्किल हो गया है। छोटे काश्तकारों ने तो फसल से लगभग उम्मीद छोड़ दी है। कई किसानों का कहना है कि यदि इस बार अपने खाने लायक सेब भी हो जाए तो वही बड़ी बात होगी। देवराना घाटी फल एवं सब्जी उत्पादक एसोसिएशन के अध्यक्ष जयेंद्र सिंह राणा ने कहा कि मौसम में लगातार आ रहे बदलाव और प्राकृतिक आपदाओं के कारण सेब उत्पादन में गिरावट दर्ज की जा रही है। उन्होंने इसे भविष्य के लिए चिंताजनक संकेत बताते हुए सरकार से काश्तकारों के हित में ठोस कदम उठाने की मांग की है।

