खरी बात: एक आदमी के आगे सब ऐवें ही हो गए पार्टी के बड़े-बड़े नेता
हरिशंकर व्यास
भारत सरकार के मंत्रियों की क्या हैसियत हो गई है? राष्ट्रीय अध्यक्ष की हैसियत के नेता भी नरेंद्र मोदी के लिए माला पकड़कर खड़े होते हैं। उस माला में घुसने की इजाजत उनको नहीं होती है। यह धारणा बनी है कि ले-देकर एक अमित शाह हैं, जिनकी कोई हैसियत है, लेकिन संसद के मानसून सत्र में यह भी दिखा कि पक्ष और विपक्ष में उनकी हैसियत पर ही उँगलियाँ उठाई गईं।
जब वे गिरफ्तारी और 30 दिन की हिरासत पर मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री को कुर्सी से हटाने वाला विधेयक पेश कर रहे थे, तो उन्होंने उसे अगली पंक्ति में अपनी निर्धारित सीट से पेश नहीं किया, बल्कि चौथी पंक्ति में अपने सांसदों के बीच खड़े होकर पेश किया। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा कि डर के मारे अमित शाह ने चौथी लाइन में खड़े होकर बिल पेश किया। जिस समय वे बिल पेश कर रहे थे, उस समय विपक्ष की ओर से बिल की प्रति फाड़ी गई और कागज के गोले बनाकर उनकी ओर उछाले गए। अब वे क्या करेंगे? क्या सभी सांसदों के ऊपर सीबीआई, ईडी छोड़ देंगे?
पिछले दिनों दिल्ली में कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के चुनाव की बड़ी चर्चा रही। भाजपा के पूर्व सांसद संजीव बालियान ने अपनी ही पार्टी के सांसद राजीव प्रताप रूडी को चुनौती दे दी। क्लब के सेक्रेटरी एडमिन के लिए हुए चुनाव में कहा गया कि बालियान को अमित शाह ने उम्मीदवार बनाया है। पुरानी भाजपा के चेहरे रूडी को हराने के लिए बालियान को लाया गया है।
संसद सत्र के बीच खुद अमित शाह वोट डालने पहुँचे। उनके साथ पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा भी थे। लेकिन रूडी ने बालियान को बड़े अंतर से हरा दिया। सात सौ वोट वाले चुनाव में रूडी एक सौ वोट से जीते। इसके बाद चर्चा रही कि रूडी ने शाह को हराया। इसी तरह गुजरात में सहकारिता के हालिया चुनावों में भी अमित शाह के उम्मीदवारों के हारने की चर्चा है। संघ के लोगों ने अमित शाह के उम्मीदवारों को हरा दिया। वह भी गुजरात में। इसका क्या अर्थ है? उनकी छोटे, मामूली चुनाव में भी धाक नहीं रही। न गुजरात में वे अपना प्रदेश अध्यक्ष बनवा पा रहे हैं और न उत्तर प्रदेश में? योगी ने उन्हें यू.पी. में ऐसे ही बना डाला है!
पिछले दिनों एन.डी.ए. के सांसदों की बैठक हुई, जिसमें ऑपरेशन सिंदूर को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सम्मान किया गया। उस समय मोदी ने सबको याद दिलाया कि अमित शाह सबसे लंबे समय तक केंद्रीय गृह मंत्री रहने का रिकॉर्ड बना चुके हैं, तो उनका भी सम्मान होना चाहिए। उनका जबरदस्ती सम्मान हुआ। मगर बाकी जो लंबे समय से मंत्री बने हुए हैं, वे नाराज हो गए और कहते हैं कि उन्होंने शिकायत करने में कोई कोताही नहीं बरती। आखिर कई नेता लगातार 11 साल से मंत्री हैं।
नितिन गडकरी एक ही विभाग में 11 साल से मंत्री हैं और पूरे देश में उनके कामकाज की चर्चा होती है। राजनाथ सिंह भी छह साल से ज्यादा समय से रक्षा मंत्री हैं और पाँच साल गृह मंत्री रहे हैं। कई और मंत्री हैं जो 2014 से लगातार सरकार में हैं। लेकिन उनके स्वागत के लिए कभी मोदी ने नहीं कहा। लेकिन बुनियादी सवाल तो यह है कि इन मंत्रियों को भी क्या मतलब है? क्या कोई मंत्री अपने कामकाज की तारीफ या शाबाशी की चर्चा पाता है? सब तो एक आदमी के आगे ऐसे ही हो गए हैं। सारे मंत्रालय एक जगह से चलते हुए हैं। बाकी सब डाकिया का काम करने के लिए मंत्रालय में बैठाए गए हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

