असलियत: भ्रष्ट गठजोड़ के आगे लाचार और बेबस ‘अदृश्य शिकारी’

असलियत: भ्रष्ट गठजोड़ के आगे लाचार और बेबस ‘अदृश्य शिकारी’
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देहरादून। देश की लाखों एकड़ वनभूमि पर घुसपैठ हो चुकी है, वन्य जीवों के आश्रय स्थलों में मची लूट का खामियाजा 13000 से अधिक तेंदुओं को भुगतना पड़ रहा है। नेताओं, अफसरों और भूमाफियाओं के गठजोड़ ने इस जीव के अधिकार क्षेत्र को कम कर दिया है, जिससे उनके बीच आंतरिक संघर्षों में इजाफा हो रहा है। ऐसे में अपना क्षेत्र छोड़ने को विवश तेंदुए आबादी वाले इलाकों का रुख कर इंसान को खौफजदा कर रहे हैं।
तेंदुआ बिल्ली प्रजाति का सबसे छोटा प्राणी है, अदृश्य शिकारी के नाम से विख्यात नर तेंदुए का वजन 65 किलोग्राम और मादा का भार 40 किलोग्राम के आसपास होता है, ऐसे में शेर और बाघ जैसे बड़े शिकारी जानवरों के मुकाबले इसका भोजन भी अपेक्षाकृत काफी छोटा होता है। अगर तेंदुआ आदमखोर न हुआ हो तो वह इंसान पर अधिकांशतः आत्मरक्षा में ही आक्रमण करता है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के अनुमान के अनुसार भारत के जंगलों में 12,000 से 14,000 तेंदुए हैं, जिसे अच्छी खासी तादाद कहा जा सकता है। ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण विनाश, वनों की कटाई और वन आरक्षित क्षेत्रो में निरंतर बढ़ते अतिक्रमण से भोजन और आश्रय की तलाश में तेंदुए जैसे जंगली जानवर उन जगहों पर जाने को मजबूर हो रहे हैं, जहां मनुष्यों के रिहायशी स्थान हैं।
शहरीकरण की तेज रफ्तार के अलावा भी कुछ ऐसे कारक भी हैं, जिनके कारण तेंदुए आबादी वाले इलाकों में हमला करते देखे जा रहे हैं। जिनमें से एक रियल एस्टेट परियोजनाएं भी हैं, जिसने तेंदुओं के प्राकृतिक आवास को कम कर दिया है। ऐसे में तेंदुओं को अपने अधिकार क्षेत्र वाले जंगलों में कम शिकार मिल रहे हैं और उनका अधिकार क्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है। नतीजतन उनके बीच आंतरिक संघर्ष बढ़ गए हैं और ‘तनावग्रस्त’ होने के चलते वह लोगों पर हमला करने से भी नही चूक रहे हैं।
वन्य जीव विशेषज्ञों का तो कम से कम यही मानना है। निरंतर निर्मित हो रही मानव बस्तियों ने वन्य जीवों के क्षेत्रों में अतिक्रमण की बाढ़ ला दी है। परिणामस्वरूप वन और उसके आस-पास के क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं। बाघों जैसी बड़ी प्रजातियों के विपरीत तेंदुए मानव बस्तियों के आसपास भी रह सकते हैं। इसके अलावा शिकार की प्रजातियों की कमी के कारण भी तेंदुए कुत्तों, बकरियों और कुछ मामलों में गायों जैसे छोटे स्तनधारियों की तलाश में मानव बस्तियों का रुख कर लेते हैं।
उत्तराखंड के निर्माण के बाद प्रत्येक शहर का अंधाधुंध फैलाव हुआ है, पहले जहां जंगल और सन्नाटा पसरा रहता था, वहां वाहनों का शोर शराबा, लोगों की चहलकदमी और सड़कों का जाल दिखाई पड़ता है। ग्रीन बेल्ट आज कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुकी है, जिसने सीधे तौर पर वन्यजीवों को तनावग्रस्त कर दिया है। शाकाहारी जीवों में कमी से तेंदुए जैसे मांसाहारियों के समक्ष प्रतिकूल हालात उत्पन्न हो गए हैं और इसके पीछे वह लोग हैं जो वन क्षेत्रों में अतिक्रमण को बढ़ावा देकर लोगों और वन्यजीवों की जान को जान को जोखिम में डालने का प्रयास कर रहे हैं। वन क्षेत्रों से लेकर नाजुक पहाड़ों पर बेतहाशा निर्माण कर पारिस्थितिकी को बदलने का प्रयास किया जा रहा है और इस पर लगाम लगाने वाला कोई नहीं है।

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