स्मरण:  चिपको आन्दोलन की 49 वीं वर्षगांठ पर चिपको नेत्री गौरादेवी को शत् शत् नमन

स्मरण:  चिपको आन्दोलन की 49 वीं वर्षगांठ पर चिपको नेत्री गौरादेवी को शत् शत् नमन
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उत्तराखंड की जनता को चाहिए  सुनियोजित विकास !

अनंत  आकाश

आज  चिपको आन्दोलन की 49 वीं वर्षगांठ है। आज ही के दिन 26 मार्च 1974 को  गौरादेवी के नेतृत्व में रैणीगांव की महिलाओं ने पेड़ों पर चिपक कर सरकार के  ठेकेदारों को वनों  को काटने से रोका था।  जंगलों को  बचाने की उनकी    यही पहल समय के  साथ एक  मुहिम की  शक्ल लेती गयी, जो  देश- दुनिया में चिपको आन्दोलन के रूप में विख्यात हुई। इस आन्दोलन के प्रणेता थे कामरेड गोबिंद सिंह रावत, जिन्होंने अपने साथियों के साथ गांव – गांव जाकर लोगों खासकर महिलाओं  को  जगाने का अभियान चलाया। उन्हीं में थीं गौरादेवी एवं उनकी सहेलियां, जिन्होंने इस लड़ाई को आगे बढ़ाया। कम्युनिस्टों का इस नीति घाटी में सतत संघर्षों का इतिहास रहा है। 1974 में बद्रीनाथ मन्दिर की मरम्मत के नाम पर किये जा रहे परिवर्तन पर रोक हो,  हक-हकूकों की रक्षा के लिए चाहे रैणी गांव से शुरू चिपको आन्दोलन हो या  चांई गांव को बचाने की लड़ाई हो, या फिर भीमकाय परियोजनाओं का विरोध हो, सबके पीछे कम्युनिस्टों की
संघर्षशी भूमिका रही है। 2021 की आपदा के समय जनता के दुखदर्दों में हिरावल भूमिका भी कम्युनिस्टों ने निभाई है। आज जहाँ भी जनपक्षीय संघर्ष है, वहाँ कम्युनिस्ट ही बड़ी  सिद्दत के साथ लड़ रहे हैं । बावजूद इसके मुनाफाखोरी के चलते आज उत्तराखण्ड  बेहद अनियोजित तथा अनियंत्रित विकास के कारण भारी क्षति के कगार पर खड़ा है जो कि प्रकृति की मौलिकता व  नैसर्गिकता के खिलाफ है।
नीति घाटी में हर तीसरे चौथे साल एवलान्च आते रहते हैं।1978 में आयी आपदा ने बद्रीनाथ का पुराना बाजार ही तबाह कर दिया था। चिपको आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य ही क्षेत्र में  जल,जगंल और जमीन की रक्षा का संदेश था जो रैणीगांव की महिलाओं ने गौरादेवी के नेतृत्व में  दशकों पहले कर दिखाया था । उस जमाने में  वाईस आफ अमेरिका, बीबीसी तथा रेडियो बीजिंग से चिपको आन्दोलन की काफी चर्चा रहती  थी।
1962 में भारत- चीन युद्ध के बाद भारत सरकार तेजी से इस क्षेत्र में सामरिक जरूरतों को देखते हुए जमीनों का अधिग्रहण कर रही थी, परिणामस्वरूप अनियोजित योजनाओं के खिलाफ चिपको आन्दोलन की भूमिका की शुरूआत हुई । इसी दौरान नीतिपास के गांव तपोवन, गोबिन्दघाट तथा फूलों की घाटी में आने वाले गांव, जो कि नन्दादेवी के रास्ते पर पड़ते थे और जिनमें रैणीगांव ,पोलना व म्यूंदार आदि गांव जनजागृति अभियान चलाया जाता रहा, जिसकी अगुवाई कामरेड गोबिंद सिंह रावत  किया करते थे। बाद में जो वह जोशीमठ के ब्लाक प्रमुख रहे। तदोपरांत कामरेड बचनसिंह उनके पद पर चुने गये। कामरेड गोबिंद सिंह रावत सरकारी सेवा छोड़कर समाज के लिए समर्पित हुए। राजस्व विभाग में पटवारी होने के कारण उन्हें क्षेत्र का काफी ज्ञान था। वे चिपको आन्दोलन के बारे में पहले से ही जानते थे, क्योंकि इससे पहले राजस्थान में यह आन्दोलन हो चुका था।

गौरा देवी, जो कि मूलरूप से रैणीगांव की थीं, उनका गांव  देवदार के घने वृक्षों से आच्छादित था।  जब वन विभाग व ठेकेदार पेड़ों का कटान करने आया तब  जंगली जड़ी-बूटियों  को बचाने के लिए गौरा देवी की  अगुवाई में गांव की  महिलाओं ने पेड़ों  से चिपटकर पेड़ों की रक्षा की तथा चिपको आन्दोलन का सन्देश दुनिया को पहुंचाया । यदि हमारी व्यवस्था के लोग इस आन्दोलन से सबक लेते तो निश्चित तौर पर हम बार – बार आ रही आपदाओं के रूबरू न होते  । इन्सान बेहतर जीवन की अभिलाषा रखता है और बेहतर जीवन विकास के बिना सम्भव नहीं है। आर्थिक ,सामाजिक और भौतिकी के लिहाज़ से इस प्रकार के विकास का अन्तिम लक्ष्य मानव का जीवन स्तर सुधारना है तथा लोगों के लिए विकल्पों को बढ़ाना है।
हमारे लिए यह लक्ष्य प्रकृति के साथ सामंजस्य से ही हासिल किये जाने चाहिए। अगर लाभ प्राप्त के लिए प्रकृति से ज्यादती की गई तो परिणाम जोशीमठ जैसे ही सामने आ सकते हैं ।
प्रकृति से छेड़छाड़ का यह पहला वाक्या नहीं है। फरवरी 2021 में जोशीमठ के पास ही धौलीगंगा -ऋषिगंगा में बन रहे  बिजली परियोजनाओं को बाढ़ ने  हटाकर  सन्देश दिया था कि संवेदशनशील हिमालयी क्षेत्र में प्रकृति  के साथ ज्यादती की जाएगी तो यही हाल होगा । इस हादसे में 200 से भी अधिक लोग जिन्दा दफन हो गये थे ।
2013 में केदारनाथ में  अकल्पनीय बाढ़़ आयी। 825 किलोमीटर आलवेदर रोड, 40 हजार से भी ज्यादा पेड़ कटान तथा पहाड़ों को काट-काट कर सरकारों ने पुराने भूस्खलनों  को जगा दिया है।2013 के बाद 395 गांव खतरे में हैं  तथा 73 अत्यधिक संवेदनशील हैं ।
उत्तरखण्ड में जनसरोकारों से जुड़े अनेक लोगों का मानना है कि जोशीमठ ही नहीं बल्कि पूरे  हिमालयी राज्यों पर इस जनविरोधी  विकास का दुष्प्रभाव पड़ रहा है और इसके विरुद्ध बड़ा जन आन्दोलन चलाने की आवश्यकता है। उनका मानना है कि
“उत्तराखण्ड सहित सभी हिमालयी राज्यों के अनुभवी लोगों, देश के विशेषज्ञ वैज्ञानिकों को आमन्त्रित कर जनपक्षीय विकास  की दिशा तय की जाए ।” अंग्रेजों ने भी अपने समय में भूखस्खलनों को रोकने के लिए खास किस्म की घास रोपी तथा चाय बागान लगाये लेकिन आज हम इन चाय बगानों की भी रक्षा नहीं कर पाये। इन तमाम अनदेखियों ने हमें बेघरबार कर दिया है ।
आज फिर से जनपक्षधरता वाले लोगों को आगे आकर अपनी निर्णायक भूमिका निभाने की आवश्यकता है। उत्तराखण्ड की जनता को चाहिए सुनियोजित विकास। चिपको आन्दोलन की 49 वीं वर्षगांठ में हमें इसी उद्देश्य के साथ आगे बढ़ने का संकल्प लेना होगा।

(लेख में व्यक्त तथ्य और विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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