जयहिंद: शहीदे आजम भगतसिंह आप हमारे हीरो हैं और हमेशा रहेंगे
92वीं शहादत दिवस पर: अनंत आकाश
हिन्दुस्तान के क्रांतिकारी आंदोलन के महानायक शहीदे आजम भगतसिंह की आज 23मार्च 2023 को 92वां शहादत दिवस है। इसी दिन उनके साथ सुखदेव तथा राजगुरु को भी फांसी दी गयी थी। 28 सितंबर 1907 को लायलपुर, पंजाब में सरदार किशन सिंह के घर जन्मे भगतसिंह ने बहुत ही कम उम्र में अंग्रेजों के जुल्मों सितम को करीब से देखा भी भी और महसूस भी किया। उनकी प्राथमिक शिक्षा गांव में हुई तथा उन्होंने मैट्रिक का दाखिला नेशनल स्कूल लाहौर में लिया। भगतसिंह का परिवार आजादी के आंदोलन की मुख्यधारा से जुड़ा हुआ था तथा उनके परिवार का कुर्बानी व संघर्षों का इतिहास था। यही कारण है कि जब उन्हें फांसी की सजा हुई तो उनका परिवार आखिरी बार जब भगतसिंह को मिलने गया तो उनकी दादी ने कहा- ‘भगत सिंह तूने हमारा सर ऊंचा कर दिया…।’ भगतसिंह जब छोटे थे तो बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में जनरल डायर के आदेश पर गोलीबारी हुई जिसमें सैकड़ों की संख्या में निहत्थे लोग मारे गये तथा हजारों की संख्या में हताहत हुए, जिनमें बड़ी संख्या में बूढ़े, बच्चे व महिलाएं शामिल थीं। इस घटना से नन्हे भगतसिंह को भारी आघात लगा। उन दिनों देश के युवाओं की तरह ही भगतसिंह पर महात्मा गांधी जी का काफी प्रभाव था। वे गांधी जी को अपना आदर्श मानने लग गये थे।

20 नवंबर 1920 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गांघी जी का अहिंसा तथा असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ। महात्मा गांधी जी के आह्वान पर असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई, जिसमें सरकार को टैक्स न देना, सरकारी नौकरियों से इस्तीफा, स्कूल कालेजों का बहिष्कार जैसे कदम उठाए गये तथा विदेशी कपड़ों की होली जलाई गयी। गांधी जी के आह्वान पर पूरा देश अंग्रेजों के खिलाफ सड़कों पर उतर आया था, हजारों की संख्या में छात्र अपनी पढा़ई छोड़कर गांधीजी के असहयोग आंदोलन में कूद चुके थे। लोगों को लग रहा था कि अब जल्दी ही आजादी मिल जाएगी, किंतु चोराचोरा कांड के बाद गांधी जी ने अचानक असहयोग आंदोलन वापस ले लिया, जिस कारण लोगों में भारी निराशा हुई। युवाओं का गांधी जी से मोहमंग होने लगा। वे विकल्प की तलाश में लग गये। इस बीच लाहौर, कानपुर, दिल्ली, कलकत्ता तथा देश के अन्य हिस्सों में क्रान्तिकारी गतिविधियों में तेजी आयी, जिनसे युवा तेजी से जुड़ने लगे। 1924 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एशोसिएशन का गठन हुआ, जिसका मुख्य मकसद युवाओं को जोड़कर उन्हें आजादी के आंदोलन की क्रान्तिकारी धारा से जोड़कर अपनी गतिविधियों में तेजी लाना था। शुरुआती दौर में क्रान्तिकारियों का मकसद सरकारी तंत्र को जगह जगह नुकसान पंहुचाने तथा अपनी गतिविधियों को संचालित के लिए धन एकत्रित करना था। 9 अगस्त 1925 को काकोरी में ट्रेन लूट के पीछे भी यही मकसद था। किंतु धीरे धीरे अनुभव ने उन्हें आंदोलन का वैचारिक आधार बढ़ाने पर जोर दिया और लाहौर में 1925 को नौजवान भारत सभा का गठन तथा भगतसिंह और अन्य साथियों के जुड़ने से क्रान्तिकारी आंदोलन की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव आया। 9 व 10 सितंबर 1928 से एच आर ए अब एच आर एस ए के नाम से जाना जाने लगा। उन दिनों युवाओं पर सोवियत क्रान्ति का भी काफी प्रभाव था, इसलिए वे भगतसिंह के नेतृत्व में इसी दिशा की ओर अपने देश में बदलाव चाहते थे तथा वे पूर्ण स्वराज्य के पक्षधर थे। दूसरी तरफ गांधी जी के नेतृत्व में डोमिनियन स्टेट की मांग, जो कि आधा स्वराज्य जिसका नियंत्रण अंततः अंग्रेजी हुकूमत के पास ही रहे, दो विचारधाराओं का टकराव चल रहा था। 8 अप्रैल 1928 को पब्लिक सैफ्टी बिलों के खिलाफ भगतसिंह व बटुकेश्वर दत्त द्वारा दिल्ली असेंबली में बम फेंका गया। वे एसेंबली बमकांड के माध्यम से आवाम के सामने क्रान्तिकारियों के उद्देश्यों को रखना चाहते थे। उसके बाद दोनों ने गिरफ्तारी दी। कोर्ट में जब भी क्रान्तिकारी पेश किये जाते तो कोर्ट के माध्यम से आवाम तक अपनी बात रखते। इस प्रकार अब क्रान्तिकारी आंदोलन वैचारिक परिपक्वता से भरा हुआ था। उनका मानना था कि कौमी एकता के माध्यम से अंग्रेजों से लड़ा जा सकता है, क्योंकि हमारे देश में उस समय और आज भी ऐसी ताकतें हैं, जिन्हें कौमी एकता नापसंद रही। वे एकता तोड़ने के लिए अंग्रेजों के लिए मुखबिरी भी कर रहे थे तथा पेंशन भी ले रहे थे।

17 नवंबर सन् 1929 को साईमन कमीशन के बहिष्कार का नेतृत्व कर रहे लाला लाजपतराय पर पुलिस के बर्बर हमले तथा उनकी मौत तथा सरकार की दमनात्मक कार्यवाही के बीच क्रान्तिकारियों ने लालाजी की मौत का बदला लेने की योजना बनाई, जिसमें 17 दिसंबर 1929 को हत्या के जिम्मेदार स्कोट्स को मारने की योजना थी, किंतु मारा गया जलियांवाला बाग का हत्यारा सांडर्स ! असेंबली बमकांड के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने एक के बाद क्रान्तिकारियों की गिरफ्तारी की तथा उन पर सभी केस दर्ज किये, ताकि वे जेल से बाहर ही न आ सकें। इस बीच तमाम केसों पर सुनवाई, जेल में कैदियों के साथ हो रहे भेदभाव तथा अन्य सभी मांगों को लेकर भगतसिंह आदि क्रान्तिकारियों द्वारा लंबी भूख हड़ताल तथा अंत में खुशी खुशी देश के लिए शहादत देना ऐसी मिसाल है कि जो युगों युगों तक अन्याय व अत्याचार के खिलाफ लड़ रहे आवाम को दिशा देती रहेगी। आज फिर से हमारे समाज में साम्प्रदायिक सौहार्दपूर्ण माहौल बनाने के संघर्ष को तेज करने की आवश्यकता है, तभी हम साझी शहादत – साझी बिरासत की परम्परा की रक्षा कर सकते हैं। यही शहीदों को हमारी सच्ची ,श्रद्धांजलि होगी ।

