चिंताजनक: बदरीनाथ धाम के ऊपर मंडरा रहा ग्लेशियर टूटने का खतरा, 398 भवनों पर आ सकता है संकट

चिंताजनक: बदरीनाथ धाम के ऊपर मंडरा रहा ग्लेशियर टूटने का खतरा, 398 भवनों पर आ सकता है संकट
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देहरादून। उत्तराखंड के विश्वप्रसिद्ध बदरीनाथ धाम पर एक संभावित प्राकृतिक आपदा का खतरा मंडरा रहा है। धाम के ऊपर पहाड़ों में स्थित तीन लटकते ग्लेशियरों को लेकर वैज्ञानिकों ने गंभीर चिंता जताई है। एक नए शोध अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि इनमें से सबसे संवेदनशील ग्लेशियर टूटकर नीचे आता है तो बदरीनाथ क्षेत्र में भारी तबाही हो सकती है। इसकी चपेट में करीब 398 इमारतें और कई महत्वपूर्ण आधारभूत ढांचे आ सकते हैं।
अध्ययन के मुताबिक संभावित ग्लेशियर टूटने से 2.66 किलोमीटर सड़क, दो पुल, एक हेलीपैड और पार्किंग क्षेत्र भी प्रभावित हो सकते हैं। यह आकलन बदरीनाथ धाम की सुरक्षा के साथ ही स्थानीय आबादी, व्यापारिक गतिविधियों और चारधाम यात्रा की व्यवस्थाओं के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
आईआईएससी, कैम्ब्रिज और डीआरडीओ के वैज्ञानिकों का संयुक्त अध्ययन
28 अक्टूबर को प्रतिष्ठित शोध पत्रिका ‘Landslides’ में प्रकाशित इस अध्ययन को भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), ब्रिटेन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के शोधकर्ताओं ने संयुक्त रूप से तैयार किया है।
शोध में बदरीनाथ धाम के आसपास समुद्र तल से 4,700 से 5,465 मीटर की ऊंचाई पर स्थित तीन लटकते ग्लेशियरों का वैज्ञानिक आकलन किया गया। शोधकर्ताओं ने इन ग्लेशियरों की भौगोलिक स्थिति, संवेदनशीलता और इनके टूटने की संभावित परिस्थितियों का विश्लेषण किया है। अध्ययन में सामने आया है कि तीनों ग्लेशियरों में से एक विशेष रूप से अधिक जोखिम वाला है। इसके टूटने की स्थिति में नीचे स्थित बदरीनाथ क्षेत्र के बड़े हिस्से पर असर पड़ सकता है।
398 इमारतें, दो पुल और हेलीपैड भी जोखिम के दायरे में
अध्ययन में संभावित नुकसान का जो आकलन सामने आया है, वह चिंता बढ़ाने वाला है। ग्लेशियर टूटने की स्थिति में इसकी चपेट में आने वाले संभावित ढांचों में शामिल हैं। करीब 398 भवन और इमारतें, 2.66 किलोमीटर सड़क मार्ग, दो महत्वपूर्ण पुल, एक हेलीपैड, पार्किंग क्षेत्र और अन्य आधारभूत सुविधाएं इससे प्रभवित हो सकती हैं।
इसका अर्थ है कि खतरा केवल प्राकृतिक पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि बदरीनाथ की आवासीय, व्यावसायिक और यातायात व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। हालांकि, यह अध्ययन संभावित ग्लेशियर टूटने की स्थिति में नुकसान का आकलन है, न कि निकट भविष्य में ग्लेशियर टूटने की निश्चित भविष्यवाणी।
17 लाख श्रद्धालुओं की आवाजाही के लिहाज से अहम
बदरीनाथ धाम समुद्र तल से करीब 3,415 मीटर की ऊंचाई पर अलकनंदा नदी के किनारे स्थित है। चारधाम यात्रा का प्रमुख पड़ाव होने के कारण यहां हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। वर्ष 2025 की यात्रा में करीब 17 लाख श्रद्धालुओं ने बदरीनाथ धाम में दर्शन किए थे। ऐसे में ग्लेशियरों से जुड़े संभावित खतरे का महत्व और बढ़ जाता है। यात्रा सीजन में धाम में श्रद्धालुओं, स्थानीय निवासियों, व्यापारियों, होटल कर्मचारियों और सरकारी विभागों के कर्मचारियों की बड़ी मौजूदगी रहती है। यदि कभी ग्लेशियर टूटने जैसी घटना होती है तो जान-माल के नुकसान के साथ ही चारधाम यात्रा की व्यवस्थाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों की स्थिति पर लगातार नजर रखना आपदा प्रबंधन की दृष्टि से बेहद जरूरी है। इस अध्ययन ने बदरीनाथ क्षेत्र में संभावित जोखिमों की पहचान करने के लिए वैज्ञानिक निगरानी की आवश्यकता को सामने रखा है।
विशेषज्ञों के आकलन के आधार पर संवेदनशील ग्लेशियरों की नियमित निगरानी, जोखिम वाले क्षेत्रों का मानचित्रण, समय रहते चेतावनी प्रणाली विकसित करने और आपातकालीन निकासी की योजना तैयार करने जैसे कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि वैज्ञानिक अध्ययन से सामने आए इस संभावित खतरे को देखते हुए शासन-प्रशासन और आपदा प्रबंधन विभाग बदरीनाथ की सुरक्षा के लिए किस तरह की ठोस कार्ययोजना तैयार करते हैं। क्योंकि यहां खतरा केवल पहाड़ों में जमी बर्फ का नहीं, बल्कि उस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा का है जहां हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं।

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