पुण्यतिथि पर विशेष: मृत्यु का स्वागत करने वाले हिमवंत कवि चन्द्रकुँवर बर्त्वाल
हेमंत चौकियाल
विश्व साहित्य के इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो कई कवि ऐसे हैं जिन्होंने बहुत कम उम्र में अपने रचित साहित्य से ऊँचा मकाम बनाया है। बहुत कवियों ने मार्मिक प्रेमगीत लिखे हैं, विरह गीत लिखे हैं, लेकिन मृत्यु का स्वागत जिस उल्लास से चन्द्रकुँवर बर्त्वाल ने किया है, वह उनके साहित्य के बाहर दुर्लभ है। वे विश्व के अकेले कवि हैं जिन्होंने मृत्यु को जी भरकर जिया है भले ही इस यात्रा में कई बार विशाद के क्षण भी आये, कई बार घनघोर नैराश्य ने उन्हें घेरा लेकिन इन तमाम मनोभावों के बीच उन्होंने मृत्यु का स्वागत जिस ढंग से किया वह उनके साहित्य के विशाल फलक की एक बानगी है।
चन्द्रकुँवर बर्त्वाल का हिन्दी साहित्य जगत में पदार्पण तब हुआ जब छायावाद युग अपने चरमोत्कर्ष परुण था,जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला अपने आप को हिन्दी साहित्य जगत में स्थापित कर चुके थे। ऐसे समय में चन्द्रकुँवर बर्त्वाल रूद्रप्रयाग, पौड़ी की कंदराओं में प्रकृति वर्णन के छंदों के साथ देश की स्वतंत्रता के गीत मुखरित स्वरों में गा रहे थे। हिन्दी के वरिष्ठ समालोचकों और साहित्यकारों ने उन्हें हिन्दी का कालीदास कहा है। आइए उनके बारे में कुछ जानकारी प्राप्त करें-
जन्म – 20 अगस्त 1919।
जन्म स्थान – रुद्रप्रयाग जनपद के पट्टी तल्ला नागपुर के मालकोटी गाँव में।
माता-पिता -श्रीमती जानकी देवी, ठाकुर भूपाल सिंह बर्त्वाल।
भाई – बहिन- जयकृत सिंह तथा तीन बहिनें- कुँवरी, आनन्दी व सत्यवती।
पिता का व्यवसाय – उडामांडा के नजदीक एंग्लो इण्डियन वर्नाक्यूलर मिडिल स्कूल नागनाथ के प्रधानाध्यापक।
शिक्षा – दीक्षा-
तीन वर्ष की अवस्था में अक्षरारंभ घर पर ही प्रारंभ। कक्षा 1से तीन तक की पढ़ाई घर पर ( नागनाथ) में । कक्षा 4 व 5 की पढ़ाई प्राथमिक शिक्षा उडामांडा में। 11वर्ष की अवस्था में कक्षा 7 उत्तीर्ण किया।
सन 1932 में मिशन स्कूल चोपड़ा में चन्द्रकुँवर को भर्ती कर दिया गया। 1935में हाई स्कूल पास। 7 जुलाई 1935 को डीएवी कॉलेज में प्रवेश लिया। 17वर्ष की उम्र में 1937 में इन्टमीडिएट पास कर लिया।
बीए इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सन 1939 में बीए।1941में लखनऊ विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास (एमए) में प्रवेश।
पहली कविता-
पुरातन, जो 13वर्ष की उम्र में 12पंक्तियों की थी।
प्रथम प्रकाशित कविताएं – पौड़ी से क्षत्रियवीर (1934-35) के अंकों में। 31मार्च 1941 को लैन्सडाउन से प्रकाशित 31मार्च 1941के कर्मभूमि के अंक में निराला से परिचय के बाद घराट और स्मरण कविताएं।
इन्ही कविताओं में नाम कुँवर सिंह बर्त्वाल के बजाय चन्द्रकुँवर बर्त्वाल छपा।
अभिन्न मित्र शम्भु प्रसाद बहुगुणा से परिचय-
17 दिसम्बर 1932 शम्भु प्रसाद बहुगुणा से पौड़ी में परिचय।
पौड़ी प्रवास की कविताएं – ओ प्रभात, देवी-दानवी, पौड़ी की रामलीला, छाया-समुद्र गुप्त विजय आदि गद्य रचनाएं।
पौड़ी प्रवास के दौरान प्रकाशित कविताएं –
क्षत्रिय वीर और नवप्रभात में भी कुछ रचनाएँ प्रकाशित हुई।
चूहा बिल्ली- 7 अगस्त 1939 को कर्मभूमि में छपी तथा बाद में विशाल भारत ने भी इसे छापा।
बुद्धि बल्लभ थपलियाल से परिचय –
मिडिल के इम्तिहान के दौरान, श्रीनगर में कांसखेत, मिडिल स्कूल के प्रधानाध्यापक जयानंद थपलियाल के सुपुत्र बुद्धि बल्लभ से परिचय।
अन्य रचनाएं-
20 जुलाई 1935 – काफल पाक्कू, मेघ, देहरादून, पृथ्वीरुदन, काफल पाक्को, मेघलोचन ।
16वर्ष की उम्र में रची गयी।1935 तक उनकी 25 से अधिक कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छ्प चुकी थी।
तपेदिक के प्रारंभिक लक्षणों का पता – 1938-1939के आखिर में। इलाहाबाद में इलाज, फिर लखनऊ में इलाज। इसी समय पैतृक गाँव मालकोटी वापस जाने के बजाय पिता द्वारा खरीद किये गये पवांलिया के घर में रहने चले गये। यहाँ साहित्य साधना चलती रही। इसी काल खण्ड में उन्होंने प्रेम पर आधारित कविताएं लिखी।
लखनऊ के साकेत निवास में उन्होंने गीत माधवी, वीणा नन्दिनी, पावस गीत, यम यशोगान, हिमालय कविता सहित लखनऊ कविता की रचना की।
निराला से परिचय-
लखनऊ में सूर्य कांत त्रिपाठी निरालासे परिचय। निराला ने ही उनका नामकरण कुँवर सिंह बर्त्वाल से चन्द्रकुँवर बर्त्वाल किया।
लखनऊ प्रवास की रचनाएं-
हिमालय, गीत-माधवी, रोहिणी, बीजाणंद, पावस, गीत, ऋतुओं सम्बन्धी रचनाएं, यम यशोगान व्यंग्य कविताएं अनेक कहानियां, निबंध,विभिन्न प्रबुद्ध जनों को लिखे गये (स्मृति) पत्र लखनऊ और पवांलिया की ही उपज हैं।
दिसंबर 1941के अंत में चन्द्रकुँवर पुन: अस्वस्थ रहने लगे।
उनके चाचा नरेंद्र सिंह उन दिनों ऊखीमठ में पटवारी थे तो चन्द्र कुँवर ऊखीमठ चिकित्सालय में भी स्वास्थ्य लाभ लेते रहे।
लखनऊ के डॉ हरगोविंद चिकित्सालय में उपचार किया, फिर भंवाली टीबी सेंटर में इलाज। भंवाली सेनेटोरियम से छुट्टी मिलने के बाद चन्द्रकुँवर हरिद्वार आये। हरिद्वार में उन्होंने की व्यंग्य कविताएं, प्रेम गीत व मृत्यु सम्बन्धित कविताओं की रचना की। 1942 में चन्द्रकुँवर गांव आ गये।
1943 में अगस्त्यमुनि में हरिदत्त बेंजवाल द्वारा स्कूल के प्रधानाचार्य बनाये गये।
1944 में एक बार फिर उन्हे चमोली अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। 1945 में बहुत जादा अस्वस्थ होने पर अपने सहपाठी बुद्धि बल्लभ थपलियाल को बुलाकर प्रधानाचार्य पद सौंपा और स्वयं पंवालिया (भीरी) चले गए। 1945-46 में कवि को दो बार ऊखीमठ चिकित्सालय में भर्ती किया गया। लौटकर स्थाई रूप से पंवालिया ही आ गये।
पहली पुस्तक की प्रकाशन- 1945 में हिमवंत का एक कवि नाम से मित्र शम्भु प्रसाद बहुगुणा ने पहली पुस्तक प्रकाशित की ,जिसके कारण कवि का परिचय हिन्दी साहित्य प्रेमियों को मिला। 1946 में ‘नन्दिनी’ नाम की उनकी पुस्तक का प्रकाशन भी श्री बहुगुणा ने करवाया।
बीमारी के कारण अछूत की स्थिति के कारण पत्राचार से ही तत्कालीन कुछ कवियों से उनका सम्पर्क बना। बीमारी की चरम स्थिति में 14 सितम्बर 1947 को 28 वर्ष 24 दिन की अल्पायु में देहांत हुआ।
कवि की मृत्यु के बाद उनके मित्र शम्भु प्रसाद बहुगुणा ने उनके गाँव (जहाँ कवि मृत्यु के समय थे) पहुँचकर उनके लिखी बचे – खुची पाण्डुलिपियों व पन्नों को अपने साथ लखनऊ ले गये। जहाँ 2अक्टूबर 1950 को उन्होने अलकनंदा मन्दाकिनी प्रकाशन, 2-हुसेनगंज लखनऊ से चन्द्र कुँवर की पुस्तक ‘विराट हृदय’ नाम से प्रकाशित की। इसके बाद पयस्वनी(1951),गीतमाधवी (1951),जीतू(1952),प्रणयनी (1952),सहित 1953 तक कुल 18पुस्तकें शम्भु प्रसाद बहुगुणा ने प्रकाशित करवाईं। इन पुस्तकों को पढ़ने के बाद साहित्य जगत को चन्द्रकुँवर के साहित्य की विशालता और गहराई तो पता चली परन्तु अभी तक उनकी रचनाओं, व्यक्तित्व और कृतित्व पर 30 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं पर उन्हें वह सम्मान मिलना अभी शेष है, जिसके वे हकदार थे।
कवि के पारिवारिक जन स्व डॉ योगम्बर सिंह बर्त्वाल, चन्द्रकुँवर बर्त्वाल शोध संस्थान के पूर्व अध्यक्ष कमलेश गुसाईं, वर्तमान अध्यक्ष हरीश गुसाईं, शिक्षक और साहित्यकार गिरीश बेंजवाल, शिक्षक साहित्यिकार सुधीर बर्त्वाल, दस्तक के संपादक और संस्कृति प्रकाशन के प्रकाशक दीपक बेंजवाल, दस्तक के ई सम्पादक कालिका प्रसाद काण्डपाल, प्रकृति संस्था के अध्यक्ष व शिक्षक गजेन्द्र रौतेला, उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी और वरिष्ठ पत्रकार अनूसूया प्रसाद मलासी, चन्द्रदीप्ति पत्रिका के सम्पादक व शिक्षक विनोद प्रकाश भट्ट, कलश संस्था के संयोजक व शिक्षाविद ओमप्रकाश सेमवाल, चन्द्रकुँवर बर्त्वाल स्मृति मंच के नरेन्द्र सिंह कण्डारी, लोक मंच भीरी आदि प्रबुद्ध जनों द्वारा स्व चन्द्रकुँवर बर्त्वाल की साहित्य साधना को जन सामान्य के सामने लाने के लिए अपने अपने तरीकों से सराहनीय प्रयास किया जा रहा है। राज्य से बाहर पृथ्वी सिंह केदारखण्डी द्वारा भी कवि के साहित्य का प्रचार – प्रसार करके कवि के साहित्य से जन-जन को परिचित कराने का प्रयास हो रहा हो लेकिन कवि को साहित्य जगत में उनका वास्तविक स्थान दिलवाने के लिए मीडिया और सरकारों को भी एक बड़ी भूमिका निभाने की परम आवश्यकता है ताकि भावी पीढ़ी कवि चन्द्रकुँवर बर्त्वाल को जानने के साथ साथ अपने साहित्यिक इतिहास से भी परिचित हो सके।
(लेखक उत्तराखंड के वरिष्ठ शिक्षक और साहित्यकार हैं )

