उपलब्धि: शरीर की गतिविधियों से खुद ऊर्जा पैदा करेगा स्मार्ट बैंडेज, घाव भरने में मिलेगी विद्युत उत्तेजना
आईआईटी रुड़की और आईएनएसटी मोहाली के शोधकर्ताओं ने विकसित की 3D-MIDAS तकनीक, बैटरी और बाहरी ऊर्जा स्रोत की जरूरत नहीं
देहरादून। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की (आईआईटी रुड़की) के शोधकर्ताओं ने इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईएनएसटी), मोहाली के सहयोग से एक ऐसा स्मार्ट, स्व-संचालित इलेक्ट्रॉनिक बैंडेज विकसित किया है, जो शरीर की सामान्य गतिविधियों से विद्युत संकेत उत्पन्न कर सकता है। यह तकनीक घाव भरने की प्रक्रिया में सहायक विद्युत उत्तेजना उपलब्ध कराने के साथ-साथ बैटरी, तार या किसी बाहरी ऊर्जा स्रोत की आवश्यकता को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
शोधकर्ताओं ने इस तकनीक को 3D-MIDAS (3D Monolithic Integrated Dipolar-Ionic Fibrous Architectural Scaffold) नाम दिया है। यह एक लचीली त्रि-आयामी रेशेदार संरचना है, जो शरीर की गतिविधियों के दौरान उत्पन्न यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत संकेतों में परिवर्तित करती है। यानी चलने-फिरने या शरीर के किसी हिस्से के खिंचने जैसी सामान्य गतिविधियां ही बैंडेज को ऊर्जा प्रदान करने में मदद कर सकती हैं।
शरीर की हरकत से पैदा होगी ऊर्जा
घाव भरना एक जटिल जैविक प्रक्रिया है। त्वचा के क्षतिग्रस्त होने पर ऊतक की मरम्मत में मदद करने वाले प्राकृतिक विद्युत संकेत बाधित हो जाते हैं। 3D-MIDAS को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि यह घाव के स्थान पर विद्युत उत्तेजना उपलब्ध कराने के साथ-साथ लचीला और वायु-संचार योग्य बना रहे।
इसकी विशेष संरचना घाव से निकलने वाले द्रव के प्रबंधन में भी सहायता करती है। यह स्कैफोल्ड अपनी मूल लंबाई की लगभग 800 प्रतिशत तक खिंच सकता है, जिससे यह शरीर की गतिविधियों और त्वचा के फैलाव-सिकुड़ाव के अनुरूप ढलने में सक्षम होता है।
तकनीक में विद्युत रूप से सक्रिय नैनोफाइबर और आयनिक रूप से प्रवाहकीय नेटवर्क को एक ही त्रि-आयामी रेशेदार संरचना में एकीकृत किया गया है। सामग्री के खिंचने पर दोनों घटक मिलकर विद्युत संकेत उत्पन्न करते हैं।
प्रयोगशाला परीक्षणों में उत्साहजनक परिणाम
इस तकनीक का प्रयोगशाला और पशु अध्ययनों के माध्यम से परीक्षण किया गया। प्रयोगशाला परीक्षणों में 3D-MIDAS ने नियंत्रण परिस्थितियों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक कोशिका प्रसार और 2.5 गुना अधिक कोशिका प्रवासन प्रदर्शित किया। ये दोनों प्रक्रियाएं ऊतक की मरम्मत और घाव भरने के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
पशु अध्ययनों में इस ड्रेसिंग से उपचारित घावों में 13 से 15 दिनों के भीतर लगभग 90 से 95 प्रतिशत तक घाव बंद होने की स्थिति देखी गई। इसके अलावा नई रक्त वाहिकाओं के निर्माण में वृद्धि, ऊतक संरचना में सुधार और कोलेजन के अधिक जमाव के संकेत भी मिले।
चलते-फिरते चूहों पर भी बना विद्युत आउटपुट
शोधकर्ताओं ने यह भी जांचा कि क्या बैंडेज वास्तविक शारीरिक गतिविधियों के दौरान विद्युत ऊर्जा उत्पन्न कर सकता है। स्वतंत्र रूप से गति करने वाले चूहों के घावों पर लगाए जाने पर ड्रेसिंग ने बिना किसी बाहरी यांत्रिक उत्तेजना के, उनकी गतिविधियों के दौरान लगातार विद्युत आउटपुट उत्पन्न किया।
उपकरण ने 500 बार खिंचाव चक्रों के दौरान स्थिर विद्युत प्रदर्शन बनाए रखा। दीर्घकालिक परीक्षणों में भी तीन महीने तक इसका प्रदर्शन स्थिर पाया गया। इससे संकेत मिलता है कि यह सामग्री बार-बार होने वाले खिंचाव और यांत्रिक दबाव को सहन कर सकती है।
दूरस्थ और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं में संभावनाएं
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. के.के. पंत ने कहा कि उन्नत सामग्रियों और अंतर्विषयक अनुसंधान के माध्यम से महत्वपूर्ण स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान की दिशा में यह कार्य एक सशक्त उदाहरण है। प्राकृतिक शारीरिक गतिविधियों का उपयोग करके घाव देखभाल तकनीक को ऊर्जा प्रदान करने का विचार विशेष रूप से उन परिस्थितियों में उपयोगी हो सकता है, जहां सरल, लचीले और स्व-संचालित समाधान की आवश्यकता होती है।
प्रधान अन्वेषक प्रो. कौशिक पारिदा ने कहा कि शोध का उद्देश्य उन विद्युत-आधारित घाव भरने वाली प्रणालियों की सीमा को दूर करना था, जिनमें बाहरी ऊर्जा स्रोत की जरूरत होती है। 3D-MIDAS में शरीर की गतिविधियां ही विद्युत उत्तेजना उत्पन्न करने के लिए आवश्यक यांत्रिक ऊर्जा उपलब्ध कराती हैं।
इस तकनीक की संभावित उपयोगिता दूरस्थ स्वास्थ्य सेवाओं, आपदा एवं आपातकालीन परिस्थितियों और ऐसे क्षेत्रों में हो सकती है, जहां बैटरी या तार आधारित उपकरणों का उपयोग कठिन होता है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि नियमित चिकित्सा उपयोग से पहले मानव नैदानिक परीक्षण और व्यापक सत्यापन आवश्यक होंगे। वर्तमान अध्ययन में सैन्य उपयोग का मूल्यांकन नहीं किया गया है।

