हालात: जलते पहाड़, सोती सरकार
अनन्त आकाश
पहाड़ पिछले काफी समय से जल रहा है और हमारी सरकार और उसका प्रशासन सदैव की तरह नींद की आगोश में हैं। पहाड़ में जंगलोंं की आग से न केवल करोड़ों करोड़ रुपये की वनसंपदा खाक हो रही है, बल्कि आग से जंगलों में रह रहे निरीह प्राणियों की असमय दर्दनाक मौत हमारी व्यवस्था के लिए एक कलंक भी है। वनाग्नि से हो रहा प्रदूषण यहाँ की आबादी के स्वास्थ्य पर गहरा कुप्रभाव डाल रहा है। जहाँ सरकार अपनी जबाबदेही से बचती आ रही है वहीं प्रमुख विपक्षीदल सदैव अपने अहम तथा अपने आपसी वर्चस्व की लड़ाई में मसगूल है। जनता की किसको परवाह ? वनाग्नि से वनों के नजदीक रह रही इंसानी आबादी सर्वाधिक प्रभावित है, जिसका इस आग में हर बर्ष सबकुछ न्यौछावर हो जाता है।

राज्य का फारेस्ट विभाग कर्मचारियों एवं संसाधनों की भारी कमी से जूझ रहा है। इस सबकी जिम्मेदारी अन्ततः सरकार पर जाती है, जिसके पास अपने ऐएसोआराम के लिए सबकुछ है ,किन्तु जनता के हिस्से में सिर्फ और सिर्फ निराशा और हताशा के सिवाय कुछ नहीं। कुछ ही माह पूर्व देश के मुखिया सहित सरकार बनाने का दावा करने वाले राजनैतिक दल अब जनता के बीच से नदारद हैं। जनता के बीच वे मजहब की आड़ में कुछ न कुछ शगूफा छोड़ते रहते हैं। सही मायने में उन्हें जनता के दुख दर्दों से कोई लेना देना नहीं है। सरकार की जनविरोधी नीतियों के चलते आज पहाड़ उजड़ रहा है। जो भी विकास हो रहा है, वह केवल बड़े बड़े लोगों के लिए यहाँ के संसाधनों के लूटने के लिए किया जा रहा है ।

पहले हमारे स्थानीय निकाय ,ग्राम पंचायतें आज के मुकाबले मजबूत हुआ करती थीं। इन संस्थाओं के स्तर पर अपने क्षेत्र के विकास, शान्ति एवं सौहार्द के लिए निर्णय लिये जाते थे। पहले बजट कम होता था । विकास गुणवत्ता अधिक होती थी ।आज बजट ज्यादा होता है, काम की गुणवत्ता बहुत ही घटिया है। कारण, भ्रष्टाचार का बोलबाला। पहले वनों के रखरखाव एवं विकास के लिए वन पंचायतें हुआ करती थीं, जिससे वनों का बेहतरीन प्रबन्धन होता था। वन एवं मनुष्यों तथा वन्यजीवों में सन्तुलन हुआ करता था, लेकिन लालफीताशाही के चलते अब वन पंचायतें धीरे धीरे समाज से नदारद हो रही हैं। यही कारण है कि जनसहभागिता के अभाव तथा वन विभाग की अकर्मण्यता के कारण आज वनों का रखरखाव करने वाला कोई नहीं है । उस पर भी विकास के नाम पर प्रति वर्ष लाखों वृक्षों का काटा जाना असहनीय है। सरकार तथा तमाम प्रशासनिक एवं जनप्रतिनिधियों तथा राजनैतिक दलों को वनों के प्रबन्धन के लिए स्थानीय स्तर पर वन पंचायतों को मजबूत करते हुए जनसहभागिता सुनिश्चित करना चाहिए ,यही सही मायनों में इस समस्या का समाधान हो सकता है ।

