स्मरण:  साम्प्रदायिक एकता की प्रतीक 1857 की क्रान्ति, आजादी के मुक्ति आन्दोलन में बनी मील का पत्थर

स्मरण:  साम्प्रदायिक एकता की प्रतीक 1857 की क्रान्ति, आजादी के मुक्ति आन्दोलन में बनी मील का पत्थर
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अनंत आकाश
साम्प्रदायिक एकता की प्रतीक भारत के मुक्ति संघर्ष में 1857 की क्रान्ति आजादी के आन्दोलन में मील का पत्थर है,  जो 1757 में अंग्रेजों द्वारा पलासी युद्ध जीतने के बाद देश में चलाऐ जा रहे अनैतिक  एवं अन्यायपूर्ण शासन तथा हड़पने की नीति के खिलाफ जनविद्रोह का प्रतीक है। इसे तैयार होने में एक सदी लगी यानि 100 साल लगे, किन्तु यह क्रान्ति अंग्रेजों की संगठित ताकत के सामने अधूरी रही लेकिन इस क्रान्ति के दूरगामी परिणाम निकले।  1858 में इग्लैंड की महारानी ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन खत्म करते हुए हिन्दुस्तान के लिए कैबिनेट सचिव के अन्तर्गत 15 सदस्यीय कमेटी का गठन किया तथा हड़प नीति को समाप्त करते हुए कई सुधारों की घोषणा की ।
इस क्रान्ति का सम्पूर्ण नेतृत्व हिन्दुस्तान के अन्तिम बादशाह बहादुर शाह जफर के हाथ में था, जिन्होंने सब कुछ गवाने के बाद भी अंग्रेजों के आगे झुकना मंजूर नहीं किया। अंग्रेजों ने उन्हें बन्दी बनाकर वर्मा (म्यांमार) भेजा जहाँ उनकी कैद में ही मृत्यु हुई। इस प्रकार हिन्दुस्तान के अन्तिम बादशाह के लिए अपनी सरजमीं नसीब नहीं हुई। आज भी उनकी कब्र रंगून में मौजूद है। इतिहास गवाह है कि जहाँ बहादुर शाह जफर के अलावा झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और बेगम हजरत महल ने अंग्रेजों से लोहा ले रही थीं, वहीं कुछ  राज परिवार और कोलकाता व मुम्बई के उच्च वर्ग परिवार अंग्रेजों के लिए प्रार्थनाएं कर रहे थे। वे अंग्रेजों की हरसम्भव मदद कर रहे थे। जैसे आजादी के आन्दोलन  में कुछ लोगों ने अंग्रेजों के लिए न  केवल मुखबिरी की बल्कि जनता की एकता को तोड़ने का भी काम किया ।
भारत की गुलामी के 100 साल बाद  सैनिक कारणों से 10 मई 1857 को मेरठ छावनी में सैन्य विद्रोह हुआ। इससे तीन दिन पहले 20 एन आई ए के सैनिकों ने बन्दूकें इस्तेमाल करने से मना कर दिया था।
 इसका मुख्य कारण था कि बैरकपुर छावनी में सैनिकों को  सुअर एवं गाय की चरबी लगे कारतूसों को मुंह से तोड़ने के लिए विवश किया जा रहा था। तत्पश्चात सैनिक मंगलदेश पाण्डे के नेतृत्व में सैन्य विद्रोह की शुरूआत हुई । जिसे अंग्रेजों ने बेरहमी से कुचलकर पूरी बटालियन को ही बर्खास्त कर दिया, किन्तु बात यहीं नहीं रुकी। 10 मई को यह विद्रोह  मेरठ से  शुरू होकर 11 मई 1857 को लखनऊ, कानपुर, बरेली, बनारस,  दिल्ली , अवध, बिहार व झांसी सहित अनेक क्षेत्रों में फैल चुका था। सैनिक विद्रोह तेजी से राजनैतिक ,सामाजिक तथा आर्थिक कारणों से  जन विद्रोह में बदलकर  क्रान्ति का स्वरूप लेने लगा,  जिसे इतिहास में 1857 की क्रान्ति के रूप में प्रसिद्धि मिली। इसमें हड़प नीति के तहत बेरोजगार हो चुके कुलीन परिवारों सहित आम जनता के विभिन्न हिस्से शामिल थे। समर्थन के पीछे  वे लोग भी थे जिनका राजपाट अंग्रेजों ने कब्जा लिया था, वे लोग जो कारतूस में चरबी के प्रयोग को अपने धर्म पर हमला मान रहे थे। उनमें हिन्दू मुस्लिम सभी शामिल थे। इस क्रान्ति में वे लोग भी शामिल थे जिनके बेटों के साथ सेना में भारी भेदभाव हो रहा था व उसी काम के लिये भारतीय सैनिकों को कम और अंग्रेजों को ज्यादा वेतन एवं सुविधां दी जा रही थीं।
सेना में ज्यादा से ज्यादा पदोन्नति सूबेदारी तक थी, उन्हें अनिवार्य रूप से भारत से बाहर युद्ध के लिए भेजा जाने लगा और इस क्रांति में  वे भी महत्वपूर्ण हिस्से थे जिनके परिवार इग्लै के मैनेचैस्टर कपड़ा उद्योग के कारण बेरोजगार हो गये थे तथा उनके घरेलू हथकरघा उद्योग बन्द हो रहे थे। इस क्रान्ति में हिस्सेदार आदिवासी तथा कपास की खेती से जुड़े किसान आदि शामिल थे।  हालांकि यह आन्दोलन उत्तरी क्षेत्र में काफी व्यापक था किन्तु दक्षिण में इसका असर नहीं था। आन्दोलन कुल दो साल दो महीने एक सप्ताह तक चला जिसमें लगभग 8 लाख भारतीय शहीद हुए तथा 8 हजार अंग्रेज मारे गये थे । 165 वीं वर्षगांठ पर 1857 की इस क्रान्ति के शहीदों और  वीर योयोद्धाओं को शत शत नमन !
(लेख में प्रस्तुत तथ्य व विचार लेखक के हैं)

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