मुद्दा: मी लार्ड ! जजों को लेकर उठे विवादों का जजमेंट कौन करेगा ?
प्रशासनिक संस्थाओं पर डगमगाया जनता विश्वास
होली के दिन दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आधिकारिक निवास पर आग लग गई थी. इसके कुछ दिन बाद मीडिया में यह खबर आंधी की तरह फैली कि उनके घर से भारी मात्रा में नगदी मिली है, जिसका करोड़ों रुपये होने का अंदाजा लगाया जाने लगा. सच किसी को नहीं मालूम था. फिर सफाई आई दमकल विभाग से कि उसके कर्मचारियों को कोई कैश नहीं मिला था। पुलिस को शक था कि कुछ बोरों में कैश भरा था। सुप्रीम कोर्ट बहुत तेजी से हरकत में आया. उसने न्यायाधीश वर्मा का इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया, जहां से उन्हें पहले दिल्ली ट्रांसफर किया गया था। इलाहाबाद की बार एसोसिएशन ने इस ट्रांसफर का विरोध यह कहते हुए किया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ‘ट्रैश बिन’(कूड़ेदान ) नहीं है. बार एसोसिएशन का विरोध विशेषकर इसलिए भी था कि सिंभावली शुगर लिमिटेड 2018 के तथाकथित बैंक घोटाले में सीबीआई ने अपनी एफआईआर में और ईडी ने अपनी ईसीआईआर में न्यायाधीश वर्मा का नाम शामिल किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रेस विज्ञप्ति जारी की और कहा कि ट्रांसफर का इस केस से कोई संबंध नहीं है. दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय ने इस मामले में इन-हाउस जांच की और 21 मार्च को अपनी रिपोर्ट भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को सौंपी. सुप्रीम कोर्ट ने जले हुए नोटों को वायरल किया तथा आरोपी की जांच के लिए 3 सदस्यीय समिति गठित की. इसमें पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी. एस. संघावालिया और कर्नाटक उच्च न्यायालय की न्यायाधीश अनु शिवरामन शामिल हैं. साथ ही वर्मा को कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपने को कहा गया है।
इस केस के महत्व को अनदेखा इसलिए भी नहीं किया जा सकता कि आज जब अन्य प्रशासनिक संस्थाओं में जनता का विश्वास डगमगा गया है, तो न्यायपालिका ही एक उम्मीद की किरण नजर आती है, जिसका एकदम पाक साफ सामने आना आवश्यक है. लेकिन अफसोस कि इन दिनों एक के बाद एक न्यायिक अलमारी से ही कंकाल निकलते आ रहे हैं. इसलिए यह प्रश्न प्रासंगिक हो गया है कि ऐसे में जजों को कौन जज करेगा? कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश सौमित्र सेन ने अपने पद से बीच में ही इस्तीफा दे दिया था, जब संसद में उन्हें हटाये जाने की प्रक्रिया चल रही थी। उनके खिलाफ फंड्स की अनियमितता का आरोप था, दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश शमित मुखर्जी ने रिश्वत स्वीकार करने के आरोप लगने पर अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था।
सिक्किम हाईकोर्ट के न्यायाधीश पी. डी. दिनाकरण पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे और उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया था. फिर पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट की न्यायाधीश निर्मल यादव के दरवाजे पर कैश का मामला था. यह केस उस समय प्रकाश में आया जब 15 लाख रुपये उनके नाम से मिलती हुई एक अन्य न्यायाधीश निर्मलजीत कौर के घर पर गलती से डिलीवर हो गया था. यह 2008 की बात है। सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम ने 2009 में न्यायाधीश यादव को क्लीन चिट दे दी। उन्हें उत्तराखंड हाईकोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया, जहां से वह मार्च 2011 में रिटायर हुईं, लेकिन उनके रिटायरमेंट के अंतिम दिन सीबीआई ने उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया और यह मुकदमा अभी तक चल रहा है। न्यायाधीश यादव का ‘निर्दोष’ होना अभी तक साबित नहीं हो सका है।
न्यायाधीशों की इन अनावश्यक हरकतों पर लगाम ‘कसने के लिए सुप्रीम कोर्ट प्रयास अवश्य करता है, लेकिन वह अभी तक पूरी तरह से सफल नहीं हो पाया है। सुप्रीम कोर्ट ने 25 सितम्बर 2024 को संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीशों पर इस बात का बल दिया कि वह संयम बरतें व अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों के प्रति वफादार रहें और स्त्री जाति से द्वेष या कुछ समुदायों की ओर पूर्वाग्रहपूर्ण प्रतीत हुए बिना वस्तुनिष्ठ व न्यायोचित फैसले सुना सकें. सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के न्यायाधीश वी. श्रीशानंद की टिप्पणियों का स्वतः संज्ञान लिया, जिन्होंने एक केस की सुनवाई के दौरान बेंगलुरु की एक बस्ती को ‘पाकिस्तान’ कहा था और एक महिला वकील से महिलाओं के सिलसिले में आपत्तिजनक बात कही थी। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यों की खंडपीठ ने श्रीशानंद को तगड़ी फटकार लगाते हुए कहा, ‘हमने आपके अवलोकनों की प्रवृत्ति को देखा है. कोई भी भारत के किसी भी भाग को पाकिस्तान नहीं कह सकता है. यह राष्ट्र की क्षेत्रीय अखंडता के विपरीत है.’ सुप्रीम कोर्ट ने श्रीशानंद को इसलिए बख्श दिया क्योंकि उन्होंने खुली अदालत में माफी मांग ली थी।

