बीमा कवरेज: क्या नीति निर्माता इसे समझने को तैयार हैं ?

बीमा कवरेज: क्या नीति निर्माता इसे समझने को तैयार हैं ?
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भारत में वैसे भी आबादी का बेहद छोटा हिस्सा बीमा कवरेज में रहा है। समय गुजरने के साथ इस कवरेज का साया सिकुड़ता ही जा रहा है। बीमा विनियमन एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) की 2023-24 के बारे में जारी ताजा रिपोर्ट से सामने आया है कि उपरोक्त वित्त वर्ष में बीमा कवरेज में 3.7 फीसदी गिरावट आई। यानी इसके पहले वाले वित्त वर्ष में जिन लोगों ने बीमा करा रखा था, उनमें 3.7 प्रतिशत इसकी सुरक्षा से बाहर हो गए।
इसके बाद देश की सिर्फ 2.8 फीसदी आबादी बीमा कवरेज में रह गई है। जानकारों के मुताबिक इसका कारण प्रीमियम दरों में हुई असाधारण बढ़ोतरी है। आम तजुर्बा है कि कोरोना काल के बाद चाहे जीवन बीमा हो या मेडिकल बीमा- उनकी प्रीमियम रकम में बड़ी बढ़ोतरी हुई है।
ताजा रिपोर्ट बताती है कि 2022-23 में जीवन बीमा कंपनियों ने प्रीमियम में छह प्रतिशत बढ़ोतरी की। तो जाहिर है, जो लोग और ऊंची प्रीमियम चुकाने में सक्षम नहीं थे, उन्होंने अपनी पॉलिसी बीच में ही छोड़ दी। जबकि 2022-23 में भी उसके पहले वाले वित्त साल की तुलना में बीमा कवरेज घटा था। विरोधाभास यह है कि बीमा कवरेज घटने के बावजूद प्रीमियम से बीमा कंपनियों की आय बढ़ती चली गई है। ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि 2022-23 में भारत में प्रति व्यक्ति औसत प्रीमियम 92 डॉलर था, जो 2023-24 में 95 डॉलर हो गया। इस तरह प्रीमियम से जीवन बीमा कंपनियों की आय में 6.06 प्रतिशत वृद्धि हुई। ये रकम 8.30 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
चूंकि हर प्रीमियम पर सरकार भी 18 फीसदी जीएसी वसूलती है, इसलिए प्रीमियम बढ़ने के साथ सरकार की टैक्स वसूली भी बढ़ती जाती है। तो कंपनियां और सरकार दोनों फायदे में हैं। नुकसान में सिर्फ उपभोक्ता हैं। जिस देश में सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का पहले से अभाव हो और स्वास्थ्य सेवाएं उत्तरोत्तर निजी क्षेत्र के हाथ में जा रही हों, वहां बीमा कवरेज से लोगों का वंचित होना कितनी बड़ी चिंता की बात है, आसानी से समझा जा सकता है। मगर नीति निर्माता इसे समझने को तैयार हैं, इसके कोई संकेत नहीं हैं।

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