निर्दोष कैदी: 20 रुपये की रिश्वत का कलंक धुलने में लग गए 30 साल, सुप्रीम कोर्ट ने दो आरोपियों को किया बरी
रिश्वत मांगने का आरोप साबित नहीं होने पर गुजरात के तलाटी-सह-मंत्री और चपरासी की सजा रद्द
नई दिल्ली(आरएनएस)। गुजरात में 20 रुपये की कथित रिश्वत से शुरू हुआ भ्रष्टाचार का एक मामला करीब तीन दशक बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ समाप्त हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दोषी ठहराए गए दो सरकारी कर्मचारियों को बरी करते हुए उनकी सजा रद्द कर दी। यह मामला वर्ष 1996 से अदालतों में चल रहा था।
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने एक तलाटी-सह-मंत्री, यानी गांव स्तर के राजस्व अधिकारी, और उसके अधीन काम करने वाले एक चपरासी की सजा को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल चपरासी के पास से 20 रुपये का नोट बरामद होने के आधार पर तलाटी-सह-मंत्री और चपरासी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की संबंधित धाराओं के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि रिश्वत की मांग किए जाने की बुनियादी शर्त अभियोजन पक्ष साबित नहीं कर सका।
पीठ ने कहा कि मामले में तलाटी-सह-मंत्री के खिलाफ रिश्वत मांगने का आरोप साबित नहीं हुआ। वहीं, निचली अदालतों ने भी माना था कि चपरासी ने कोई रिश्वत नहीं मांगी थी। ऐसे में अभियोजन पक्ष का मामला टिक नहीं सकता।
अदालत ने मामले के एक महत्वपूर्ण पहलू पर गौर किया। शिकायतकर्ता को जिस आय प्रमाणपत्र की जरूरत थी, वह तलाटी-सह-मंत्री द्वारा पहले ही तैयार कर उसे सौंप दिया गया था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने चपरासी को 20 रुपये दिए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह परिस्थिति भी अभियोजन पक्ष के आरोपों पर संदेह पैदा करती है। अदालत ने माना कि चपरासी का यह तर्क संभव है कि अगले दिन ईद का त्योहार था और आय प्रमाणपत्र मिलने के बाद शिकायतकर्ता ने उसे 20 रुपये दिए थे।
पीठ ने कहा कि केवल पैसे दिए जाने या बरामद होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भुगतान रिश्वत की मांग के कारण किया गया था।
मामला फरवरी 1996 का है। एक छात्र ने कुछ शैक्षणिक रियायतों का लाभ लेने के लिए आय प्रमाणपत्र बनवाने के उद्देश्य से बेच्चेरी ग्राम पंचायत कार्यालय का रुख किया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, तलाटी-सह-मंत्री ने प्रमाणपत्र जारी करने के लिए 120 रुपये की रिश्वत मांगी थी। आरोप था कि इसमें 100 रुपये उसके लिए और 20 रुपये चपरासी के लिए थे।
इसके बाद छात्र ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो से संपर्क किया। एजेंसी ने शिकायत के आधार पर जाल बिछाया और कार्रवाई की।
मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने 30 नवंबर 1999 को दोनों कर्मचारियों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और धारा 13(1)(घ) के तहत दोषी ठहराया था।
इसके बाद मामला गुजरात हाई कोर्ट पहुंचा। हाई कोर्ट ने 22 जनवरी 2015 को अपने साझा फैसले में निचली अदालत के फैसले और दोनों कर्मचारियों की सजा को बरकरार रखा था।
करीब तीन दशक तक चले मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अब निचली अदालत और हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग साबित करने में विफल रहा और केवल 20 रुपये की बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।
अदालत ने इस संबंध में लोकायुक्त पुलिस, दावणगेरे मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। उसमें कहा गया था कि केवल भुगतान किए जाने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि वह किसी रिश्वत की मांग के कारण किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अपील स्वीकार करते हुए उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की संबंधित धाराओं के तहत दंडनीय अपराध करने के आरोप से बरी कर दिया।
अदालत ने कहा कि निचली अदालत का 30 नवंबर 1999 का फैसला, जिसे गुजरात हाई कोर्ट ने 22 जनवरी 2015 के अपने फैसले में बरकरार रखा था, रद्द किया जाता है। दोनों अपीलकर्ताओं के खिलाफ दोषसिद्धि समाप्त कर दी गई है।
दोनों कर्मचारी फिलहाल जमानत पर थे। सुप्रीम कोर्ट ने उनके जमानत बंधपत्र रद्द माने जाने का निर्देश भी दिया। इस तरह 20 रुपये की कथित रिश्वत से शुरू हुआ लगभग 30 वर्ष पुराना भ्रष्टाचार का मामला शीर्ष अदालत के फैसले के साथ समाप्त हो गया।

