आकलन: ‘मेक इन इंडिया’ उत्पाद खरीदने का आह्वान भारत के लिए कितना कारगर है?
अजीत द्विवेदी
भारत में एक और स्वदेशी आंदोलन का आह्वान किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से अपने भाषण में इसका आह्वान किया और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से लगाए गए अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ के लागू होने से पहले, यानी 27 अगस्त से पहले उन्होंने कई बार यह आह्वान दोहराया। उन्होंने देश के लोगों से अपने देश में बनी वस्तुओं का इस्तेमाल करने की अपील की। इतना ही नहीं, उन्होंने भारत के कारोबारियों से आह्वान किया कि वे देश में बना सामान बेचें। इसके बाद उन्होंने कारोबारियों से आह्वान किया कि वे अपनी दुकान के ऊपर बोर्ड लगाएँ कि, “यहाँ स्वदेशी सामान बिकता है।” प्रधानमंत्री की अपील थी, “यह त्योहारों का मौसम है। अब नवरात्रि, विजयादशमी, धनतेरस, दिवाली… ये सभी त्योहार आ रहे हैं। ये हमारी संस्कृति के उत्सव हैं, लेकिन ये आत्मनिर्भरता के भी उत्सव होने चाहिए। इसलिए, मैं आपसे एक बार फिर आग्रह करता हूँ कि हमें अपने जीवन में एक मंत्र अपनाना होगा, हम जो भी खरीदेंगे वह ‘मेड इन इंडिया’ होगा, स्वदेशी होगा।”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले 11 साल से आत्मनिर्भर भारत बनाने की बात कर रहे हैं। वे पिछले 10 साल से ‘मेक इन इंडिया’ अभियान चला रहे हैं और अब स्वदेशी आंदोलन 2.0 का ऐलान करते हुए लोगों को ‘मेड इन इंडिया’ उत्पाद खरीदने का आह्वान कर रहे हैं। सवाल है कि पिछले 11 साल में भारत अपनी ज़रूरतों के मामले में कितना आत्मनिर्भर हुआ है? इसका जवाब यह है कि इस अवधि में आत्मनिर्भर होने के बजाय दूसरे देशों पर भारत की निर्भरता बढ़ती गई है। देश के नागरिक रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीज़ों के लिए चीन और दूसरे देशों पर निर्भर हो गए हैं।
चीन के साथ भारत का कारोबार दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ा है और उसी अनुपात में व्यापार घाटा भी बढ़ा है। भारत का तेल आयात 2014 में 80 प्रतिशत के करीब था, जो बढ़कर 82 प्रतिशत हो गया है। वैकल्पिक ऊर्जा के तमाम उपायों के बावजूद भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए दूसरे देशों पर ज़्यादा निर्भर हो गया है। सिर्फ इस साल में अमेरिका से हमारी ऊर्जा खरीद पिछले साल के मुकाबले दोगुनी हो गई है। हम जो चीज़ें बनाने का दावा कर रहे हैं उनके भी ज़रूरी कंपोनेंट दुनिया के दूसरे देशों से आ रहे हैं।
हालाँकि, अब आत्मनिर्भरता की परिभाषा वही नहीं है, जो डेढ़ सौ साल पहले भारत के पहले स्वदेशी आंदोलन के समय थी। वास्तविकता यह है कि वर्तमान विश्व में कोई भी देश अपने को आत्मनिर्भर नहीं बना सकता है और न आत्मनिर्भर होने का दावा कर सकता है। अमेरिका और चीन भी अपवाद नहीं हैं। उनका काम भी दुनिया के बगैर नहीं चल सकता है। दुनिया एक गाँव में बदल गई है, जिसमें सब एक-दूसरे से जुड़े हैं और सबको एक-दूसरे की ज़रूरत है।
मनुष्य के संबंध में महान दार्शनिक अरस्तू ने कहा था, “मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है… अगर कोई समाज में रहने में अक्षम है या समझता है कि उसे किसी की ज़रूरत नहीं है क्योंकि वह अपने लिए सक्षम है तो वह या तो राक्षस है या देवता।” उसी तरह आज की दुनिया में देशों के लिए कहा जा सकता है। आज कोई भी देश यह कहने की स्थिति में नहीं है कि उसे किसी की ज़रूरत नहीं है और वह अपने लिए सक्षम है। सवाल है कि ऐसे विश्व में आत्मनिर्भरता का क्या अर्थ है? ऐसे विश्व में आत्मनिर्भरता का अर्थ बराबरी का संबंध है, जिसमें बेचारगी नहीं होनी चाहिए और यह तब होगा, जब किसी और तरीके से आप भी सक्षम होंगे। अगर आप कुछ खरीद रहे हैं तो आपके पास कुछ बेचने के लिए भी होना चाहिए। समानों के बीच ज़्यादा समानता होती है, इसका हमेशा ध्यान रखना चाहिए।
दुर्भाग्य से पिछले 11 साल से सिर्फ बातें हुई हैं और इस दौरान देश और इसके नागरिकों को सक्षम बनाने की बजाय उनको सरकारी राहतों और सरकार की कृपा पर निर्भर बनाया गया है। भारत में अमेरिका की तरह बड़ा कॉरपोरेशन बनाने की मूर्खतापूर्ण सोच में देश में पहले से चल रहे छोटे-छोटे उद्यमों को हतोत्साहित करके या मनमाने आर्थिक फैसलों व नीतियों के ज़रिए बंद करा दिया गया। नतीजा यह हुआ कि देश के लघु, सूक्ष्म और मझोले उद्यमी कारोबारी बन गए। उन्होंने अपना उद्यम बंद कर दिया और चीन व दूसरे देशों से सामान लाकर बेचने लगे। इससे भारत की निर्भरता चीन और दूसरे देशों पर बढ़ती गई।
भारत उद्यमियों की बजाय कारोबारियों का देश बन गया। इससे देश में अमीरी नहीं आई और न उपभोग बढ़ा। जानकर हैरानी होगी कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश की दुनिया के कुल उपभोग में हिस्सा सिर्फ नौ प्रतिशत है। सोचें, दुनिया का हर छठा आदमी भारतीय है लेकिन दुनिया सौ रुपया खर्च करती है तो उसमें सिर्फ नौ रुपया भारतीय लोग खर्च करते हैं, जो कम से कम 16 रुपया होना चाहिए। सो, स्थिति यह है कि भारत न उत्पादन कर रहा है और न आबादी के अनुपात में उपभोग कर रहा है। अगर हम उपभोग ज़्यादा कर रहे होते तब भी दुनिया झुकती।
आमतौर पर लोग मानते हैं कि भारत में स्वदेशी की शुरुआत महात्मा गांधी ने की थी लेकिन ऐसा नहीं है। महात्मा गांधी ने स्वदेशी को ‘स्वराज की आत्मा’ कहा था। लेकिन इसकी शुरुआत जिस समय हुई थी उस समय मोहनदास करमचंद गांधी सिर्फ तीन साल के थे। 1872 में पश्चिम बंगाल और पंजाब के महान स्वतंत्रता सेनानियों और विचारकों ने इसका सिद्धांत दिया था। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘बंगदर्शन’ के एक अंक में लिखा था, “जो विज्ञान स्वदेशी होने पर हमारा दास होता, वह विदेशी होने के कारण हमारा प्रभु बन बैठा है। हमलोग दिन ब दिन साधनहीन होते जा रहे हैं।” इसके बाद स्वदेशी को इस रूप में परिभाषित किया गया कि इसमें किसी किस्म का बल-प्रयोग नहीं होगा, बल्कि सर्वाधिक कारगर ‘नैतिक शत्रुता’ के अस्त्र से लड़ा जाएगा। 1905 में बंगाल विभाजन के समय स्वदेशी आंदोलन विरोध का एक कारगर अस्त्र बना और जब 1915 में महात्मा गांधी भारत आए तो उन्होंने लोगों से विदेशी वस्तुओं को त्यागने और स्वदेशी अपनाने का आह्वान किया।
यह ब्रिटिश हुकूमत से नैतिक शत्रुता की घोषणा थी, जिसका आह्वान नैतिकता के सर्वोच्च शिखर से महात्मा गांधी ने किया था। उन्होंने स्वयं विदेशी वस्तुओं का परित्याग किया। उनके साथ जुड़े तमाम कांग्रेस कार्यकर्ताओं और उनके घरों के लोगों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया। अंग्रेजी हुकूमत की ज्यादतियों से डरे बगैर सार्वजनिक स्थानों पर विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई।
क्या आज के भारत के नेताओं में ऐसा नैतिक बल है? क्या प्रधानमंत्री देश के सामने आकर कह सकते हैं कि वे विदेशी वस्तुओं का परित्याग कर रहे हैं और किसी भी विदेशी वस्तु का प्रयोग नहीं करेंगे? क्या उनकी कैबिनेट के सभी सदस्य एक साथ सामने आकर अपने घर की विदेशी वस्तुओं की होली जला सकेंगे? क्या भारत के नेताओं की ऐसी नैतिक आभा है कि उनके आह्वान पर लोग विदेशी वस्तुओं का परित्याग करके स्वदेशी अपना लेंगे? इन सब सवालों का जवाब नकारात्मक है। ऐसा नहीं है कि नकारात्मक जवाब सिर्फ नैतिक कारणों से है। व्यावहारिक कारणों से भी अब एक सदी पहले जैसे हालात नहीं हैं कि कोई व्यक्ति या देश पूरी तरह से विदेशी का बहिष्कार कर सके।
स्वदेशी अपनाना और देश को आत्मनिर्भर बनाना सिर्फ नारों से संभव नहीं है और न किसी देश के साथ टैरिफ को लेकर चल रहे टकराव की तात्कालिकता में संभव है। यह एक दीर्घकालिक लक्ष्य है। इसके लिए छोटे-छोटे कदम उठाने होंगे। कारोबारियों को फिर से उद्यमी बनाने के लिए सरकार को योजना शुरू करनी होगी। कारोबारियों को प्रोत्साहित करना होगा कि वे चीन से सामान लाकर बेचने की बजाय उन सामानों का उत्पादन करें। रोज़मर्रा की ज़रूरत की छोटी-छोटी वस्तुओं का उत्पादन अगर भारत में होने लगे तो सारा खेल पलट जाएगा। इसी तरह तकनीक में प्रयोगों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
विशाल और जटिल तकनीक की बजाय शुरुआत छोटी तकनीकों से हो सकती है। चीन की तरह भारत में अपना सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म विकसित हो सकता है। ज़रूरी कामकाज से लेकर मनोरंजन तक के ऐप तैयार हो सकते हैं। अपना सर्च इंजन बनाया जा सकता है। ई-कॉमर्स के प्लेटफॉर्म विकसित हो सकते हैं। ध्यान रहे, सर्विस सेक्टर में भारत अपने को बेहतर बनाए तो देशी कंपनियों को 140 करोड़ लोगों का बाजार मिलेगा। स्वदेशी अपनाने की दिखावे वाली अपील से पहले भारत में स्वदेशी वस्तुओं और सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित किए जाने की ज़्यादा आवश्यकता है। यह प्रतीकात्मक मामला नहीं होना चाहिए और किसी देश पर दबाव डालने के लिए इतने महान विचार का सतही इस्तेमाल भी नहीं किया जाना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

