तरकश़: नेता पहुंचे द्वार चुनावी मौसम में.. वोटों की दरकार चुनावी मौसम में…

तरकश़: नेता पहुंचे द्वार चुनावी मौसम में.. वोटों की दरकार चुनावी मौसम में…
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चुनावी जनगीत

नेता  पहुंचे द्वार  चुनावी   मौसम में।
वोटों  की दरकार चुनावी  मौसम में।

सबकी यही पुकार चुनावी मौसम में।
कर दो  बेड़ा  पार  चुनावी मौसम में।

पर्वत – पर्वत  चढ़े  हांफते
मैदानों  की  धूल   फांकते
गांव,शहर की गली गली में
घर-घर  जाकर वोट मांगते

खाकर भी दुत्कार चुनावी मौसम में।
लुटा  रहे  हैं  प्यार  चुनावी मौसम में।

नेता  पहुंचे द्वार  चुनावी मौसम में।
वोटों की दरकार चुनावी मौसम में।

झंडे- भौंपू, भाषण-नारे।
दारू- मुर्गा, नोट करारे।
हथकंडे ये बहुत जरूरी,
हुए चुनावी रण में सारे।

सच को पड़ती मार चुनावी मौसम में।
झूठ  भरे  हुंकार  चुनावी  मौसम  में।

नेता पहुंचे  द्वार  चुनावी मौसम में।
वोटों की दरकार चुनावी मौसम में।

कोई  अपने  काम गिनाता
कोई तोहमत सिर्फ लगाता
‘जुमलेबाजी’  कर  के कोई
मतदाता  को  है  भरमाता

दावों  की भरमार  चुनावी मौसम में।
‘वादे’ फक़त उधार चुनावी मौसम में।

नेता  पहुंचे द्वार  चुनावी मौसम में।
वोटों की दरकार चुनावी मौसम में।

कल  थे उसमें, अब हैं इसमें
कल  क्या जाने होंगे किसमें
जा सकते हैं कल फिर उसमें
लाभ  दिखेगा ज्यादा जिसमें

कई पुराने यार चुनावी मौसम में।
बन जाते गद्दार चुनावी मौसम में।

नेता पहुंचे द्वार  चुनावी मौसम में।
वोटों की दरकार चुनावी मौसम में।

राजनीति  का चस्का  ऐसा
लगे जुए  की  लत के जैसा
जीत  गए  तो हासिल होते
ठाठ राजसी, रुतबा – पैसा

होती  है  हर बार चुनावी मौसम में।
नैतिकता की हार चुनावी मौसम में।

नेता पहुंचे  द्वार  चुनावी मौसम में।
वोटों की दरकार चुनावी मौसम में।

– सुरेन रावत

( कवि के नाम का उल्लेख किए बिना सार्वजनिक मंचों पर प्रस्तुति निषिद्ध है )

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