आक्रोश: प्रस्तावित जनजाति सम्मेलन का स्थान बदले जाने के फैसले का विरोध

आक्रोश: प्रस्तावित जनजाति सम्मेलन का स्थान बदले जाने के फैसले का विरोध
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संवाददाता
मुनस्यारी, 3 नवंबर।

निदेशालय, जनजाति कल्याण उत्तराखंड द्वारा दो साल से मुनस्यारी में प्रस्तावित जनजाति सम्मेलन को अब देहरादून  में आयोजित किए जाने पर सीमांत के जनजाति के लोग भड़क गए हैं। कहा कि इसकी कीमत भाजपा सरकार को आगामी विधानसभा चुनाव में चुकानी पड़ेगी। कहा कि धामी सरकार नौकरशाहो के हाथो से चल रही है।

मुनस्यारी में दो साल पहले से राष्ट्रीय स्तर का जनजाति सम्मेलन की तैयारी की जा रही थी। सम्मेलन के लिए यहां दर्जनो बार बैठक हुई। उपजिलाधिकारी की अध्यक्षता में आयोजन को लेकर कमेटियो का गठन भी किया गया था।

कोविड 19 के कारण सम्मेलन आयोजित नहीं हो पा रहा था। इस सम्मेलन में देश भर से जनजातियो के प्रतिनिधियो को आना था। सीमांत के विकास एवं उत्तराखंड की जनजातियो के सांस्कृतिक विरासत से देशभर की जनजातियां रुबरु होते। चीन सीमा पर होने वाले इस सम्मेलन से राज्य के इस दुर्गम हिस्से को नयी पहचान मिलनी तय थी।

यहां के विकास के नये आयाम भी लिखे जाते। क्षेत्र की जनजाति कोविड 19 के नियमों में ढील का इंतजार कर रही थी।

लेकिन धामी सरकार में हावी नौकरशाही की भेंट यह सम्मेलन भी चढ़ गया। नौकरशाही ने सम्मेलन के स्तर को राष्ट्रीय से राज्य स्तरीय बना दिया। इतना ही नहीं सम्मेलन के लिए पूर्व में प्रस्तावित स्थल मुनस्यारी को बदलकर देहरादून कर दिया। सरकार में हावी नौकरशाही से नाराज जनजाति समुदाय के जन प्रतिनिधियों ने इस फैसले के खिलाफ़ आवाज बुलंद कर दी है।

जिला पंचायत सदस्य जगत मर्तोलिया, ग्राम प्रधान मनोज मर्तोलिया, कृष्णा पंचपाल, ललिता मर्तोलिया, सावित्री पांगती, गोकरण पांगती, लक्ष्मी रिलकोटिया, पंकज बृजवाल, हरेन्द्र बर्निया, महेश रावत सहित दो दर्जन पंचायत प्रतिनिधियों ने कहा कि यह प्रदेश सरकार का दूसरा धोखा है।

अगर सभी सम्मेलन देहरादून में सुविधायुक्त स्थानों में ही होना है तो फिर मुनस्यारी के जनजातियों को आज तक क्यो बेवकूफ़ बनाया। कहा कि बजट की बंदरबांट तथा लूटपाट के लिए जिस देहरादून शहर में नाम मात्र की जनजातियां रहती हैं, उस जगह को चुना गया है।

पंचायत प्रतिनिधियों ने कहा कि दूरस्थ क्षेत्रों में इस तरह के आयोजन होने ही नहीं है, तो फिर क्यों पृथक राज्य मांगा गया था। कहा कि धामी सरकार को चुनाव में इसकी कीमत चुकानी होगी।

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