नज़रिया: स्वतंत्रता दिवस 2025 के अवसर पर लें नव जागरण का संकल्प
हर्ष शुक्ला
हर वर्ष 15 अगस्त का दिन हमें सिफ़र् आज़ादी की याद नहीं दिलाता, बल्कि यह दिन हमें अपने कर्तव्यों, मूल्यों और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में भागीदारी की पुन:प्रेरणा देता है। आज जब भारत अपनी आज़ादी की 78वीं वर्षगांठ मना रहा है, तब यह आवश्यक है कि हम स्वतंत्रता के अर्थ को केवल उत्सव और परेड तक सीमित न रखें, बल्कि इसे एक सतत ज़िम्मेदारी के रूप में आत्मसात करें।
1947 में मिली स्वतंत्रता केवल सत्ता के हस्तांतरण की घटना नहीं थी, बल्कि यह एक लंबा संघर्ष था – त्याग, बलिदान और अपार धैर्य का परिणाम। महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, सरोजिनी नायडू, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे अनगिनत क्रांतिकारियों ने जिस आज़ाद भारत की कल्पना की थी, वह सिफ़र् राजनीतिक रूप से स्वतंत्र भारत नहीं था, बल्कि वह एक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से सशक्त राष्ट्र था।
आज, जब हम वैश्विक मंच पर भारत को एक सशक्त राष्ट्र के रूप में उभरते देख रहे हैं, तब यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि हम यह सोचें – क्या हमने उस आज़ादी का सार ठीक से समझा है? क्या हम हर नागरिक तक समान अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय पहुँचा पा रहे हैं? क्या हम उन मूल्यों को बचा पा रहे हैं जिनके लिए हमारे पुरखों ने संघर्ष किया था?
स्वतंत्रता केवल एक ऐतिहासिक उपलब्धि नहीं, बल्कि यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। आज़ादी का अर्थ केवल अधिकारों की बात करना नहीं, बल्कि कर्तव्यों की पूर्ति भी है – जैसे स्वच्छता रखना, कानून का पालन करना, पर्यावरण की रक्षा करना और सामाजिक सौहार्द बनाए रखना।
2025 का यह स्वतंत्रता दिवस हमें तकनीकी विकास, डिजिटल क्रांति और वैश्विक सहयोग के नए अवसर दे रहा है। परंतु यह भी याद दिला रहा है कि इन उपलब्धियों का लाभ हर भारतीय तक पहुँचे, यह सुनिश्चित करना हमारा नैतिक दायित्व है।
हमें युवाओं में एक नई चेतना जगानी होगी – एक ऐसी चेतना जो न केवल अपने अधिकारों के प्रति सजग हो, बल्कि देश और समाज के प्रति अपने दायित्वों को भी समझे। हमें गांधी के ‘सर्वोदय’ के सपने को, आंबेडकर के सामाजिक न्याय को और भगत सिंह के समतामूलक समाज को यथार्थ में बदलना होगा।
इस स्वतंत्रता दिवस पर आइए, हम सभी यह संकल्प लें –
कि हम भारत को न केवल आर्थिक रूप से समृद्ध, बल्कि नैतिक रूप से भी मज़बूत बनाएँगे।
कि हम स्वतंत्रता को केवल विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की ज़िम्मेदारी मानेंगे।
कि हम नफ़रत से नहीं, प्रेम और संवाद से आगे बढ़ेंगे।
जय हिंद
(लेखक आरएनएस के संपादक हैं)

