संबंध: ट्रंप की ब्रिक्स देशों को दी गई धमकी के निहितार्थ
अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने धमकी दी है कि ब्रिक्स देशों ने अपने कारोबार को डॉलर से हटाने की कोशिश की, तो वे उन सबके यहां से अमेरिका होने वाले आयात पर 100 फीसदी सीमा शुल्क लगा देंगे। ब्रिक्स में कई ऐसे देश शामिल हैं, जो अमेरिका के घोषित मित्र हैं। मगर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। कनाडा जैसे सहयोगी देश पर 25 फीसदी सीमा शुल्क लगाने का एलान ट्रंप पहले ही कर चुके हैं। उनका इरादा यूरोपीय देशों पर भी ऐसी कार्रवाई का है।
ऐसा लगता है कि ऐसी घोषणाएं करते समय ट्रंप भूल जाते हैं कि नई भू-आर्थिकी के बीच वे जो कार्ड खेल रहे हैं, वो दोधारी है। उसका उलटा असर भी होगा। डॉलर की भूमिका के लिए आज चुनौती पेश आई है, तो उसकी एक वजह यह है कि अपनी उत्पादक क्षमता खोने के बाद अमेरिका बाकी दुनिया के लिए अपरिहार्य नहीं रह गया है।
डॉलर को वैश्विक कारोबार की मुद्रा बनाने में अमेरिकी आर्थिक ताकत का सबसे प्रमुख योगदान था। इससे अमेरिका को ये विशेष सुविधा मिली। इस कारण देश अपने यहां उत्पन्न मूल्य का एक हिस्सा अमेरिका के नियंत्रण में भेजने को विवश हो गया। यह ऐसी ताकत थी, जिसका विवेकपूर्ण उपयोग कर अमेरिका लंबे समय तक इस विशेष सुविधा को बनाए रख सकता था। लेकिन भू-राजनीतिक और कूटनीतिक मकसदों को साधने के लिए उसने इस ताकत का अनियंत्रित दुरुपयोग शुरू कर दिया। नतीजतन, उससे प्रतिबंधित देशों की उसकी सूची लंबी होती चली गई।
लाजिमी है, प्रतिबंधित एवं प्रतिबंधों की आशंका झेल रहे देश विकल्प की तलाश में जुटते। उसका परिणाम फिलहाल अपनी मुद्राओं में अंतरराष्ट्रीय भुगतान करने के चलन में दिख रहा है। ब्रिक्स ऐसे सामूहिक प्रयास का मंच बना है। चल चुके इस चक्र को रोकना अब कठिन है। ट्रंप प्रतिबंधों की राह छोड़ने और डॉलर के अंतरराष्ट्रीय भुगतान के मंच स्विफ्ट से किसी देश को बाहर ना करने का एलान करते, तो शायद वे कुछ सकारात्मक परिणाम हासिल कर सकते थे। लेकिन उन्होंने वही तलवार उठाई है, जिसके इस्तेमाल का नतीजा डॉलर से बचने की परिघटना के रूप में सामने आया है।

