चिंतन: भ्रष्टाचार से पीड़ित देशवासियों को कैसे बचाएंगी सरकारी एजेंसियां ?

चिंतन: भ्रष्टाचार से पीड़ित देशवासियों को कैसे बचाएंगी सरकारी एजेंसियां ?
Spread the love

ओमप्रकाश मेहता
क जमाना था, जब राजनीति को सही अर्थों में जनसेवा का सशक्त माध्यम माना जाता था, किंतु अब यही माध्यम भ्रष्टाचार का सशक्त माध्यम बन गया है और आज के सत्ताधीश इस सामाजिक कोढ़ को मिटाने के नहीं, बल्कि इसके विस्तार के माध्यम बने हुए हैं। सवाल अब भ्रष्टाचार को सिर्फ आगे बढ़ाने का नहीं, बल्कि उसे कानूनी रूप से रोकने या खत्म करने की शपथ लेने वाली एजेंसियां भी इस कोढ़ के विस्तार का माध्यम बना दी गई हैं। आज की राजनीति ने सीबीआई व सीआईडी जैसी सरकारी जांच ऐजेंसियों को अपने तुच्छ इरादों और मकसदों का माध्यम बना रखा है और इन तथाकथित स्वतंत्र जांच एजेंसियों पर कब्जा कर इन्हें इनके कार्य व दायित्व को ईमानदारी से निभाने में अवरोध पैदा करना शुरू कर दिया है।
इन्हें स्वतंत्र रूप से अपने दायित्व निर्वहन की अनुमति ही नहीं दी जा रही है, इसका ताजा उदाहरण हाल ही में केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) द्वारा जारी रिपोर्ट है, जिसमेें खुलासा किया गया है कि केन्द्रीय अन्वेष्ण ब्यूूरो (सीबीआई) गंभीर भ्रष्टाचार से सम्बन्धित 212 मामलों की जांच करके दोषियों को दंडित करना चाहती है, लेकिन चूंकि इस जांच के लिए केंद्र व सम्बन्धित राज्य सरकारों की मंजूरी कानूनी तौर पर जरूरी है और केंद्र व सम्बन्धित राज्य सरकारों में विराजित आरोपित अधिकारी व नेता जांच करवाना नहीं चाहते, इसलिए सीबीआई इनकी जांच नहीं कर पा रही है, सीबीआई के पास ऐसी जांच की अनुमति के प्रकरण पिछले वर्षों से लम्बित हैं और सम्बन्धित भ्रष्ट अधिकारी व नेता यह जांच होने नहीं देना चाहते?
अब यहां सवाल यह है कि जिनकी जांच होनी है, वे ही भला जांच की अनुमति कैसे देगें? यह अनुमति का प्रावधान रखा ही क्यों गया? जब सीबीआई, सीआईडी कों स्वतंत्र जांच एजेंसी का दर्जा दिया गया है तो फिर उनकी स्वतंत्रता’ क्यों छीन ली गई? आज इसी बात को लेकर केंद्रीय सतर्कता जांच आयोग (सीवीसी) कॉफी परेशान है, फिर सवाल यह भी है कि सीबीसी (सतर्कता आयोग) जब कानूनी रूप से स्वतंत्र है तो सलाहों को केन्द्र व राज्य सरकारें मानती क्यों नहीं हैं?
सीबीआई ने दिसम्बर 2023 तक की जारी अपनी रिपोर्ट में उन मामलों का भी जिक्र किया है, जिनमें जांच में दोषी पाए गए अफसरों के खिलाफ आयोग की सिफारिशों को भी दर-किनार कर दिया गया। इनमें विभिन्न मंत्रालयों और केंन्द्र सरकार के अधीन संस्थाएं (पीएसयू बैंक आदि) शामिल हैं। सीबीसी केंन्द्रीय मंत्रालयों और पीएसयू बैंकों में मुख्य सतर्कता अधिकारियों (सीबीओ) के जरिए भ्रष्टाचार व अनियमितताओं पर नजर रखता है।
इस रिपोर्ट में मुख्य राज्य सरकारों व केंद्र शासित राज्यों में लम्बित मामलों की जानकारी भी दी गई है, जिनमें महाराष्ट्र में तीन, उत्तरप्रदेश में दस, पश्चिम बंगाल में चार, जम्मू-कश्मीर में चार, पंजाब में चार, मध्यप्रदेश में एक व अन्य पन्द्रह मामले हैं। इन 41मामलों में 149 अधिकारी शामिल बताए गए हैं। इनके अलावा 81 अन्य मामले तीन माह से ज्यादा पुराने हैं। लम्बित मामलों में 249 अधिकारियों के खिलाफ 81 मामले लम्बित हैं। इनकी लम्बे समय से जांच रिपोर्ट आ जाने के बाद भी अभियोजन की मंजूरी के अभाव में ये मामले लम्बित हैं और सरकार के विभिन्न पदों पर अभी भी विराजित ये अधिकारी अपनी भ्रष्टाचार की भूख को शांत नहीं कर पा रहे हैं और उसमें दिन दूनी रात चौगनी अभिवृद्धि हो रही है।
अब सीबीआई अपने दायित्व का निर्वहन पूरी निष्ठा व ईमानदारी के साथ करना चाहती है, किंतु वह करे कैसे? अभियोजन की मंजूरी का अवरोध सामने जो है? अब सवाल यही मूल है कि भ्रष्टाचार मिटे कैसे, उसे मिटाने की किसी को चाहत तो हो? इसका एक ही सरल उपाय है सीबीआई, सीआईडी को जांच की अनुमति के बन्धन से मुक्त कर उसे स्वतंत्र छोड़ दिया जाए, जो आज के इस युग में सम्भव नहीं है।
जांच और इस मामले में स्पष्ट व न्यायपूर्ण सोच के अभाव में यह रोग अब महारोग बनता जा रहा है, जो संक्रमण की तरह हर सरकार को खोखला करता जा रहा है और इस बारे में कहीं किसी भी दिशा या स्तर पर गंभीरता नहीं है।
आखिर यही हाल रहा तो इस देश का क्या होगा? इस सवाल का अब कोई महत्व नहीं है, क्योंकि इसका उत्तर किसी के पास भी नहीं है, चिंतित है तो केवल और केवल भ्रष्टाचार से पीड़ित देशवासी।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

Parvatanchal