नज़रिया: कथनी और करनी के फ़र्क को दिखाता निंदा प्रस्ताव
अशोक शर्मा
अभी अभी दूसरी बार निर्वाचित लोक सभा स्पीकर ओम बिरला ने लोकसभा में आपातकाल की निंदा वाला प्रस्ताव पढ़ा जिसमें उन्होंने कहा कि ‘1975 में कांग्रेस द्वारा लगाया गया आपातकाल इतिहास का एक ऐसा कालखंड है, जो काले अध्याय के रूप में दर्ज है। उन्होंने कहा कि इस कालखंड में देश पर तानाशाही थोपी गई थी और लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचला गया था एवं अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंट दिया गया था। नागरिकों के अधिकार नष्ट कर दिए गए थे। आपातकाल के समय संविधान में संशोधन करने का लक्ष्य एक व्यक्ति के पास शक्तियों को सीमित करने का था। हम सभी आपातकाल के दौरान कांग्रेस की तानाशाही सरकार के हाथों अपनी जान गंवाने वाले नागरिकों को स्मृति में मौन रखते हैं।’
ये सत्य है कि जून 25 , 1977 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इदिरा गाँधी ने आपातकाल घोषित कर दिया था और ये आपातकाल 21 महीनों यानि 21 मार्च 1977 तक लागू रहा और ये भारतीय लोकतंत्र के इतिहास पर एक काला धब्बा है। ये आपातकाल एक ऐसे दु:स्वप्न की तरह है जो हमेशा लोकतांत्रिक संस्थानों को लोकतांत्रिक मूल्यों एवं नागरिकों की स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा करने की जिम्मेदारी का अहसास कराता रहेगा।
ओम बिरला के ‘निंदा प्रस्ताव’ को हम इस रूप में भी समझ सकते हैं कि नागरिकों को उनके अधिकारों से वंचित करना घोर अन्याय की पराकाष्ठा है और इसके कितने भंयकर दुष्परिणाम हो सकते हैं। इस प्रस्ताव को एक शपथ के रूप में देखना चाहिए कि भविष्य में कभी इसकी पुनरावृत्ति न हो। लेकिन यह भी सत्य है कि खुद ओम बिरला ने 17 वीं लोकसभा के स्पीकर के रुप में अपनी शक्तियों का विवेकहीन दुरुपयोग करते हुए विपक्ष के कई सदस्यों को निलंबित कर दिया था। इसी प्रकार सरकार द्वारा संस्थाओं और कानूनों को पक्षपातपूर्ण तरीके से दुरुपयोग करते हुए सिविल सोसाइटी, राजनीति एवं मीडिया में विरोधी सुरों का दमन किया गया एवं कुचला गया। इन सब को देखते हुए तो यह निंदा प्रस्ताव एक दिखावा ही लगता है और प्रदर्शित करता है कि सरकार की कथनी और करनी में कितना फर्क है। निंदा प्रस्ताव वास्तव में कांग्रेस को निशाना बनाने का राजनीतिक षड़यंत्र सा लगता है। सच्चाई यह है कि सत्ताधारी भाजपा ने विगत वर्षों में बिना आपातकाल घोषित किए ही पिछले दरवाजे से आपातकाल जैसी कई ज्यादतियां की हैं।
जैसा कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता खडगे ने कहा भी कि भाजपा का शासन एक अघोषित आपातकाल है। यदि वर्तमान सरकार वास्तव में 1975 के आपातकाल को लेकर इतनी गंभीर है तो क्यों आए दिन सरकार द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता पर आक्रमण, ई डी और सीबी आई जैसी एजेंसियों का विपक्षी दलों के नेताओं को निशाना बनाने के लिए दुरुपयोग, और पीएमएलए और अन्य कठोर कानूनों का सहारा लेकर विपक्षी राजनीतिज्ञों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को बिना ट्रायल के जेल में रखना और उनके खिलाफ अनर्गल एवं अवांछित आरोप लगाना इत्यादि एक आम बात हो गयी है और ये लगातार जारी है ? भाजपा के तानाशाही रवैये एवं उसके नेताओ द्वारा संविधान बदल देने वाले बयानों का खामियाज़ा उसे 2024 के चुनाव में उठाना पड़ा है और वह बहुमत के आंकड़े से काफी दूर रह गई। सबसे बड़ा झटका उस राज्य उत्तर प्रदेश में लगा जहां राम मंदिर बनने के बाद वह अपनी शानदार जीत के प्रति पूरी तरह आश्वस्त थी।
हालांकि 2024 के चुनाव के परिणामों को देखकर ये नहीं लगता कि जनता ने भाजपा को पूरी तरह नकार दिया परंतु इन परिणामों ने भारतीय लोकतांत्रिक सस्थानों में जिम्मेदार पदों पर आसीन कई व्यक्तियों को सशक्त किया है और तानाशाही का विरोध करने का साहस और शक्ति जरूर प्रदान की है। एक सशक्त विपक्ष जो सदन में सत्तारुढ़ सरकार से सवाल कर सके, जनता की आवाज उन तक पहुंचा सके ,एक सशक्त एवं सतर्क न्यायपालिका जो पक्षपातपूर्ण, बलपूर्वक, एवं अन्याय पूर्ण तरीके से बंंदी बनाए गए लोगों को न्याय दिला सके और एक ऐसी सिविल सोसायटी जो दुरुपयोग किये जाने वाले कानूनों को हटाने के लिए दबाव बना सके और एक ऐसा सत्तारुढ़ दल जो इन सबके साथ तारतम्य बना के सरकार चला सके, यही सब वो कदम हैं जो हमारे देश को निर्णायक रूप से आपातकाल जैसी घोर परिस्थितियों से निजात दिला सकते हैं और वर्तमान सरकार उपर्युक्त सभी बातों को अमल में लाकर ही अपनी कथनी और करनी में समरूपता ला सकती है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

