नज़रिया: मौजूदा दौर में लोकतंत्र के अंतर्मन में निर्भय होने का स्वप्न

नज़रिया: मौजूदा दौर में लोकतंत्र के अंतर्मन में निर्भय होने का स्वप्न
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प्रफुल्‍ल कलखोलिया
म चुनाव 2024 का पहला चरण 19 अप्रैल को पूरा हुआ। राजनीतिक विश्लेषक और विशेषज्ञ मतदान प्रतिशत में गिरावट और लोकतंत्र के पर्व के प्रति लोगों के उदासीन रुझान की व्याख्या अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं। चुनाव संघर्ष के लिए समान अवसर की स्थिति, स्वतंत्र निष्पक्ष निर्भय एवं दबाव से मुक्त वातावरण में चुनाव संपन्न होने की संभावनाओं का आकलन, राजनीतिक औद्धत्य से बने सामाजिक वातावरण और लोकतांत्रिक संस्कृति की समझ के स्तर पर भी बातचीत की जा रही है।
सभी निष्कर्षों तक पहुंचने और इसका अर्थ हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। आम लोगों के लिए इन निष्कर्षों का निश्चित रूप से महत्व होगा। मीडिया है इन निष्कर्षों का सकारात्मक प्रभाव भी पड़ेगा। मतदान में नागरिक भागीदारी का अनुपात भी बढ़ सकता है। हां, समय पर आम लोगों तक इन निष्कर्षों का पहुंचना भी कोई कम बड़ी चुनौती नहीं है। चुनौतियां तो कई हैं। फिलहाल एक बड़ी चुनौती ‘भय’ को समझने की कोशिश करना यहां अप्रासंगिक नहीं होना चाहिए।
मनुष्य की कुछ मौलिक वृत्तियां हैं। मौलिक वृत्तियों का पूर्ण निषेध नहीं हो सकता है। इन वृत्तियों में कुछ वृत्तियां सकारात्मक होती हैं और कुछ वृत्तियां नकारात्मक मानी जाती हैं। ‘मानी जाती हैं’ कहने का आशय यह है कि कोई भी मौलिक वृत्ति पूरी तरह से नकारात्मक या सकारात्मक नहीं होती है। इन का नकारात्मक या सकारात्मक होना परिस्थितियों पर निर्भर करता है। ‘निर्भय’ का अर्थ भय-शून्यता या भय हीनता नहीं होता है, न व्यक्ति के संदर्भ में और न ही समाज के संदर्भ में। किस सामान्य मनुष्य के मन में किसी तरह के ‎‘भय’ का बिल्कुल न होना भी नकारात्मक है। ध्यान देने की बात है कि हर समय मन में किसी-न-किसी ‎‘भय’ का हमेशा सक्रिय रहना भी खतरनाक होता है। मन के ‘भय-ग्रस्त’ रहने की स्थिति भी नकारात्मक ही होती है।
समाज के निर्भय होने का स्वप्न अभी तक स्वप्न ही है। यथार्थ की जमीन से दस अंगुली ऊपर ही रहता है निर्भय होने का स्वप्न। लोकतंत्र के यथार्थ में निर्भय के स्वप्न के समावेश और कुछ लोग जो सत्ता के साथ अपनी कट्टर स्पष्टता से हैं, उन के मन में विधि, विधान, संविधान का कहीं कोई भय नहीं है। सत्ता के साथ कट्टर स्पष्टता से होने का मतलब है, कोई सवाल नहीं, किसी तरह का कोई सवाल नहीं। जिस को जो मिलेगा, अधिकार से नहीं कृपा से मिलेगा। उसी को मिलेगा जिस पर कृपा होगी, उतना ही मिलेगा जितनी कृपा होगी। इसे और स्पष्टता से समझने के लिए एक प्रसंग। पूजा करते समय पुरोहित, “इदम चंदनम” कहते हुए वह भगवान को कुछ भी अर्पित करता है तो, ‘भगवान और जजमान’ दोनों को यही मानना होता है कि वह चंदन है। अगर पुरोहित कहे “इदम पुष्पम” तो फिर ‎‘भगवान और जजमान’‎ दोनों को ही उसी वस्तु को पुष्प मान लेना होता है।
तो शक्ति किस के हाथ हुई! सत्य निर्धारण की शक्ति! न ‎‘भगवान’ के हाथ, न ‘जजमान’‎ के हाथ! सत्य निर्धारण की शक्ति होती है पुरोहित के हाथ। ‘पुरोहित’ में सब लीन, जजमान भी, भगवान भी, राष्ट्र भी, संविधान भी! भारत के लोकतंत्र में सत्ता का ‘पुरोहित’ कौन होता है या कौन है, यह कहने की जरूरत नहीं है। इतना ही कहा जा सकता है कि ‎‘पुरोहित’ ने राष्ट्र को भगवान और नागरिक को जजमान बना दिया है! “इदम” कह कर ‘पुरोहित’ जो भी थमा दे, उसे वही मान लेना होगा, राष्ट्र को भी नागरिक को भी।
महात्मा बुद्ध ने दुख का कारण बताया था, वह अपनी जगह तरह-तरह से सत्य था और है। अभी के भारत में संविधान और लोकतंत्र के रहते दुख का एक बड़ा कारण है, सिर उठाकर चलने की कोशिश। सुख-सागर में गोता लगाने का उपाय है करुण कंठ से क्रुद्ध स्वर में ‘जयजय’ करना या फिर दुम दबाकर कदमों में दुबकने की कला में पारंगत होना! ‘जय’ क्या होता है! महाभारत के अनुसार सभी ‘आर्ष ग्रंथों’ की संज्ञा ‘जय’ है। सत्य क्या है! सत्य के निर्धारण की शक्ति ‘पुरोहित’ के हाथ है, इसे चुनौती नहीं दी सकती है। चुनौती देने पर कोई दाभोलकर हो जा सकता है, फादर स्टेन स्वामी, शुभकरण सिंह, रोहित वेमुला कुछ भी हो जा सकता है; गौरी लंकेश हो जा सकती है, साक्षी मलिक हो जा सकती है।
अधिकार और हक की बात करनेवालों को चाहे वह सत्ता के द्वारा जंगलों में धकेल दिया गया कोई समूह हो, या ऑलंपिक का मैडल जीतकर देश का मान बढ़ाने के कारण सत्ता के द्वारा सम्मानित किया गया हो, राजकीय अंधविश्वास और असत्य का भेद खोलनेवाला कोई भी हो, अन्न उपज की जायज कीमत की मांग करनेवाला किसान हो सब की एक ही दुर्गति है। संविधान है, लोकतंत्र है, इतनी बड़ी संख्या में न्याय पुरुष हैं। सब अपनी जगह सही हैं। बस चुनावी सत्ता के सामने अधिकार और हक की बात न करे कोई। स्थिति ऐसी कि चाहे कोई जितना भी बड़ा अधिकारी रहा हो, रिटायर्ड आयुक्त ही क्यों न हो या साधारण ‘बाल-बच्चेदार’ ही क्यों न हो, यदि कुछ कहे बिना रह नहीं पाता है तो, बचाव के लिए अपना नाम ‘उजागर’ न होने की नैतिक शर्त पर ही कह पाता है!
लोकतंत्र से उम्मीद रहती है कि वह लोकतांत्रिक माहौल में सत्ता की संस्कृति का परित्याग कर सभ्यता की संस्कृति को अपनाये और समाज और राष्ट्र के आम सदस्यों और नागरिकों में सभ्यता की संस्कृति को बढ़ावा दे। सभ्यता की शुरुआत से ही मनुष्य सत्ता की संस्कृति की प्रभुता के कारण कई समस्याओं से जूझता रहा है, जिन में से सबसे ‎बड़ी समस्या है, भय। सभ्यता के इस छोर पर यह उम्मीद रही है कि लोकतांत्रिक माध्यम से सभ्यता की संस्कृति की समवायी लघुता समाज के निर्भय होने के स्वप्न को संभव कर सकती है, लोकतंत्र के ‎अंतर्मन में कोहराम मचानेवाले सत्ता के शोर को संगीत में बदल सकती है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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