मुद्दा: एक देश, एक चुनाव’ का सुझाव लागू करते वक्त तलाशने होंगे जरूरी सवालों के जवाब

मुद्दा: एक देश, एक चुनाव’ का सुझाव लागू करते वक्त तलाशने होंगे जरूरी सवालों के जवाब
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राज कुमार सिंह
बेशक एक साथ चुनाव देश विशेष की राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसमें दो राय नहीं कि एक साथ चुनाव से खर्च काफी घट जाएगा। आचार संहिता के दौर में प्रशासनिक शिथिलता भी बार-बार देखने को नहीं मिलेगी, लेकिन इस व्यवस्था के खतरे भी हैं।
अंतिम निष्कर्ष तो समय ही बताएगा, लेकिन ‘एक देश, एक चुनाव’ के विषय पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समिति की रफ्तार और विधि आयोग की ताजा कवायद से लगता है कि इस दिशा में कामकाज गति पकड़ने लगा है। कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति को पंचायत और नगर पालिका से लेकर लोकसभा तक सभी चुनाव एक साथ कराने के मुद्दे पर रिपोर्ट देनी है। एक सितंबर, 2023 को गठित समिति अपने अब तक के कामकाज की समीक्षा कर चुकी है। पिछले छह माह के दौरान समिति ने राजनीतिक दलों से लेकर जनसाधारण तक से इस मुद्दे पर सुझाव मांगे हैं। जनसाधारण में अधिकांश की राय भले ही सकारात्मक हो, लेकिन राजनीतिक दलों की राय बंटी हुई नजर आती है।
भाजपा और उसके मित्र दल ‘एक देश, एक चुनाव’ के विचार के पक्षधर हैं। एक साथ चुनाव कराने में उन्हें वे सभी लाभ नजर आते हैं, जो इसके पैरोकार गिनाते रहे हैं। मसलन, चुनाव खर्च में भारी कमी आएगी, आचार संहिता के चलते सरकार की निर्णय प्रक्रिया और प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होने से बचा जा सकेगा। सबसे बड़ी बात यह कि राजनीतिक दल भी हमेशा चुनावी दबाव में रहने से मुक्त हो जाएंगे। दूसरी ओर भाजपा विरोधी दलों को इसमें संघवाद और राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण तथा राष्ट्रीय मुद्दों से विधानसभा और स्थानीय चुनावों को भी प्रभावित कर क्षेत्रीय दलों को नुकसान की सुनियोजित साजिश दिखती है। उन्होंने इस विचार का न सिर्फ विरोध किया है, बल्कि अधिनायकवादी सोच करार देते हुए आलोचना भी की है।
इस बीच विधि आयोग भी इस मुद्दे पर संविधान संशोधन की सिफारिश करने की तैयारी में है। कहा यही जा रहा है कि विधि आयोग भी अगले पांच साल में तीन चरणों में विधानसभाओं का कार्यकाल एक साथ करने की सिफारिश कर सकता है। ताकि एक साथ चुनाव की कवायद मई- जून 2029 में लोकसभा चुनावों के साथ हो सके। याद दिलाना जरूरी है कि ‘एक देश, एक चुनाव’ कोई अनूठा विचार नहीं है। 1951 से लेकर 1967 तक देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ ही होते रहे। उसके बाद ही यह प्रक्रिया भंग हुई। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लोकसभा चुनाव निर्धारित समय से एक साल पहले कराने के फैसले ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई। उन परिस्थितियों को जानना भारतीय राजनीति के इतिहास और चरित्र को समझने में मददगार होगा। कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए गैर कांग्रेसी दलों में 1963 से ही शुरू हुई तालमेल की कवायद का परिणाम यह निकला कि 1967 में कुछ राज्यों में संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनीं। राजनीतिक जोड़तोड़ के चलते वे अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकीं। ऐसे में उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, पश्चिम बंगाल एवं नगालैंड में मध्यावधि चुनाव अवश्यंभावी हो गए। कमोबेश उसी समय कांग्रेस में सत्ता-संघर्ष चल रहा था। पंडित जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी दोहरी चुनौतियों से रूबरू थीं। एक ओर कांग्रेस का जनाधार सिकुड़ने लगा था, तो दूसरी ओर कांग्रेस के पुराने स्थापित क्षत्रप उन्हें खुल कर काम नहीं करने दे रहे थे।
अंतत: इंदिरा गांधी ने 1969 में कांग्रेस का विभाजन करा दिया। कांग्रेसजनों का बड़ा हिस्सा उनके साथ आया। संसद में सीपीआइ, द्रमुक एवं कुछ अन्य दलों के समर्थन से वह सत्ता में भी बनी रहीं। तभी उन्होंने बैंकों के राष्ट्रीयकरण और पूर्व राजघरानों के प्रिवीपर्स बंद करने के लोक लुभावन फैसले किए। जब पूर्व राजघरानों के प्रिवीपर्स बंद करने का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया तो इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर अपनी अपनी नीतियों पर जनमत संग्रह के लिए समय पूर्व चुनाव का दांव खेला। विभाजन के बाद भी ज्यादातर प्रदेश संगठन इकाइयों पर इंदिरा विरोधी पुराने कांग्रेसियों का ही कब्जा था। सो, इंदिरा गांधी ने पूरा चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों और अपनी करिश्माई छवि पर केंद्रित रखा। उनका दांव सफल रहा। विपक्षी गठबंधन को मात देकर 43 प्रतिशत मतों के साथ इंदिरा गांधी 350 सीटें जीतने में सफल रहीं, पर देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराने की प्रक्रिया पर विराम लग गया। फिर आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को बेदखल कर केंद्रीय सत्ता में आई जनता पार्टी सरकार के पतन के बाद तो लोकसभा के भी मध्यावधि चुनाव जरूरी हो गए। उसके बाद कुछ अपवादों के अलावा केंद्रीय राजनीति भी अस्थिरता का शिकार रही। वर्ष 1996 और 98 में निर्वाचित लोकसभा अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई तो 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने शाइनिंग इंडिया का नारा देते हुए समय पूर्व चुनाव का दांव चला, जो उलटा पड़ गया। 2014 में अकेले दम बहुमत के साथ केंद्रीय सत्ता में आने और फिर कई राज्यों में भी अकेले दम पर या गठबंधन सहयोगियों के साथ सुविधाजनक बहुमत की सरकारें चलाते हुए भाजपा को लगता है कि एक साथ चुनाव की प्रक्रिया में वापस लौटा जा सकता है।
बेशक, एक साथ चुनाव देश विशेष की राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसमें दो राय नहीं कि एक साथ चुनाव से खर्च काफी घट जाएगा। आचार संहिता के दौर में प्रशासनिक शिथिलता भी देर तक नहीं रहेगी। इस व्यवस्था के खतरे भी हैं। विधानसभा चुनाव अकसर राज्य के और स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं। एक साथ चुनाव कराने पर क्या स्थानीय मुद्दे गौण नहीं हो जाएंगे? क्या जन आकांक्षाओं की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति बाधित नहीं होगी? बड़ी संख्या में संसाधनों की दरकार भी होगी। सवाल यह भी बड़ा है कि कार्यकाल के बीच ही सरकारों के बहुमत खो देने पर जोड़तोड़ से वैकल्पिक सरकार बनेगी या फिर राष्ट्रपति शासन के जरिए लोकतंत्र को स्थगित रखा जाएगा? इन सवालों का जवाब हर तरह की विभाजक रेखाओं से ऊपर उठ कर देना चाहिए। इसी पर लोकतंत्र और देश का भविष्य निर्भर करेगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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