धर्मग्रंथ: देश में सौ से ज्यादा रामायण प्रचलित हैं
अजय दीक्षित
वाल्मीकि रामायण की रचना का निर्धारित समय पता नहीं। पुरातत्त्वविदों के अनुसार वैदिक सभ्यता लगभग 1000 ई.पू. में गंगा के मैदानी क्षेत्रों में पनपी। लेकिन रामायण का विविध रूपों में संस्कृत में लिखित पुनर्कथन 2000 वर्ष पहले हुआ। इस प्रकार, सैकड़ों वर्षों तक इस कथा का मौखिक प्रसारण हुआ होगा। लगभग 1000 वर्ष पहले रामायण का पुनर्कथन क्षेत्रीय भाषाओं में होने लगा। तमिल में कम्बन-रामायण पहला पुनर्कथन था। उसके पश्चात तेलुगु, असमी, बंगाली, कन्नड़, मलयालम, मैथिली और अवधी में पुनर्कथन होते गये। इन पुनर्कथनों के माध्यम से राम भक्ति परम्परा का आदर्श बन गए, और लोग उन्हें भगवान के रूप में पूजने लगे। 20वीं सदी में रामानंद सागर ने रामायण पर लोकप्रिय धारावाहिक बनाया। यह मुख्यत: तुलसीदास की अवधी रामायण (रामचरितमानस) पर आधारित है। ओडिया साहित्य में भी 15वीं और 18वीं सदियों के बीच रामायण के कई पुनर्कथन हुए। आइए, उनमें से कुछ घटनाएं जानते हैं। संभवत: आपने यह कहीं और सुनी नहीं होंगी। ध्यान रहे कि अधिकांश भारतवासी रामायण की कहानी इन क्षेत्रीय पुनर्कथनों को अपनी-अपनी मातृभाषाओं के माध्यम से ही सुनते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि राम भारतीय कला और संस्कृति में व्यापक हैं।

1. शबरी के आम : शबरी के जूठे बेरों की कहानी वाल्मीकि रामायण या तुलसी रामायण में नहीं, बल्कि प्रियदास द्वारा 18वीं सदी में लिखित ‘भक्ति-रस-बोधिनी’ में पाई जाती है। वैष्णव संतों पर कहानियों का यह संग्रह ब्रजभाषा में लिखा गया था। हे सम्भवत:, इस कहानी का स्रोत उसके 200 वर्ष पहले द्घ ओडिया रामायण की कहानी में मिलता है। उस कहानी के अनुसार, सीता की खोज करते समय, राम एक 1 जनजातीय पुरुष (शबर) और स्त्री (शबरी) से मिले थे। उन्होंने राम के चरणों को धोकर उन्हें एक आम प्रस्तुत किया। हालांकि शबरी के पास के अधिकांश आमों पर दांतों केचिह्न थे। उसने राम को एक ‘सुंदरी’ आम प्रस्तुत किया, जिस पर कोई चिह्न नहीं था। इस पर राम ने कहा, आपको कैसे पता कि यह आम दूसरे आमों जितना मीठा है? आपने उसे चखा ही नहीं है। मुझे ऐसा ! आम दें जो आप जानती हैं कि मीठा है। इस प्रकार राम ने जूठा आम खाकर ‘जाति शुद्धता’ के नियमों को नकारा ।
2. ओडिशा में पुरी के जगन्नाथ मंदिर के ‘साही जत्रा’ में एक अनोखी छवि देखने मिलती है, जिसमें आठ वानर (अष्ट-मल्ल या आठ योद्धा) एक विशाल पक्षी के पंखों पर बैठे चित्रित हैं। कहते हैं कि यह विशाल पक्षी सम्पाती का पुत्र है। वह हनुमान सहित अन्य वानरों को आकाश में ले गया था, ताकि वे लंका को देख सकें। सम्पाती जटायु के ज्येष्ठ भाई हैं। जटायु को तपती सूर्य की किरणों से बचाते समय सम्पाती के पंख जल गए थे। वे दक्षिणी समुद्र तट पर मृत प्राणियों का मांस खाकर जीते थे।

सम्पाती ने देखा कि वानर निराश थे। वे सीता की खोज नहीं कर पाए थे और इसलिए घर लौटने के बजाय भूखा मर जाना चाहते थे। वानरों को राम और जटायु की बात करते हुए सुनकर सम्पाती को कौतूहल हुआ, क्योंकि एक ऋषि ने उन्हें बताया था कि यदि वे सीता को ढूंढने में राम की मदद करेंगे तो उनके पंख फिर से उगने लगेंगे। सम्पाती के कहने पर उनका पुत्र वानरों को पंखों पर बिठाकर आकाश में ले गया । वहां से उन्हें लंका दिखाई दी। लेकिन केवल सम्पाती के पुत्र को सीता दिखीं, क्योंकि पक्षियों की दृष्टि वानरों की दृष्टि से तेज होती है। सीता की खोज सम्पाती के पुत्र की मदद से की गई थी, इसलिए सम्पाती के पंख फिर से उगने लगे।
लंका पहुंचने पर राम और सुग्रीव ने सुवाल पर्वत से लंका का निरीक्षण किया। रावण भी राम और उनकी सेना को आंकने के लिए पुष्पक विमान से आकाश में उठा। रावण का सिंहासन सैकड़ों राजसी छतरियों से सजा था। वे भव्य दिख रही थीं। राम ने बाण से छतरियां मार गिराईं। धरती पर गिरकर वे मशरूम बनीं और समुद्र में गिरकर जेलीफिश अर्थात छत्रिक। यह घटना ‘छत्र-कट्टा’ कहलाई।

