विभूति: शांतिदूत और अहिंसा के पुजारी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 154 वीं जयंती पर शत् शत् नमन !

विभूति: शांतिदूत और अहिंसा के पुजारी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 154 वीं जयंती पर शत् शत् नमन !
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अनंत आकाश

मोहनदास करमचंद गांधी भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और नेताओं में एक प्रमुख स्थान रखते हैं। उनका जन्म गुजरात के पोरबन्दर में 2 अक्टूबर 1869 में हुआ । गांधी जी ने दुनिया भर में अपनी मौजूदगी दर्ज करायी है। उनके अधिकांश विचार कमाल के थे और उनकी उपयोगिता आज भी कायम है ।

गांधी जी का दृढ मत था कि उनके साथ रहने वालों को फर्श पर सोना होगा, साधारण कपड़े पहनने होंगे, सुबह उठना होगा, साधारण खाने पर जिंदा रहना होगा और अपना टोयलेट खुद साफ करना होगा। उनका मानना था कि हमारा प्रत्येक क्षण मानव सेवा में खर्च होना चाहिए।

गांधी जी द्वारा अहिंसा, सविनय अवज्ञा, सत्याग्रह और असहयोग जैसे हथियार हमें दिये गये, जिनमें हड़ताल, बहिष्कार, भूख हड़ताल, सविनय बगावत, असहयोग, करो या मरो जैसे मुद्दे शामिल थे।

गांधी जी को “महात्मा” की उपाधि रवींद्रनाथ टैगोर ने दी थी और उन्हें महान आत्मा बताया था। गांधी जी की देन भी काफी हैं। वे खुले खेतों में शौच की जगह टॉयलेट के हामी थे, स्वास्थ्य, सफाई, शिक्षा, सांप्रदायिक एकता पर अमल के हामी थे। चर्चिल ने गांधी जी को आधा नंगा फकीर कहा था और आह्वान किया था कि गांधी और उसके वाद को कुचल दो।


बापू अपने जीवन में 2338 दिन जेलों में रहे। 249 दिन दक्षिणी अफ्रीका में और 2089 दिन भारत की जेलों में बिताये। उनका कहना था कि अपने प्यार का मल्हम भारत के घावों पर लगाओ। आंदोलन के दौरान बापू ने 6 हफ्तों तक मौन व्रत धारण किया था।

माऊंटबेटन ने गांधी जी के बारे में कहा था- ‘हमने उसे जेल भेजा, हमने उसका अपमान किया, हमने उससे नफरत की, हमने उसे हिकारत की नजरों से देखा और हमने उसे अनदेखा किया, मगर गांधी तो गांधी थे, वे अपने आदर्शों से विचलित नहीं हुए।

गांधी जी का मानना था कि आवश्यक चीजों और जरूरतों का न्यायपूर्ण वितरण होना चाहिए। सामाजिक और आर्थिक असमानता, नफ़रत और हिंसा पैदा करती है। उनका अपने राजनैतिक शिष्यों को कहना था- ‘सत्ता से सावधान रहो, सत्ता भ्रष्ट कर देती है, याद रखना कि तुम गांव के गरीबों की सेवा करने के लिए सत्ता में हो।’
गांधी जी ने अपने जीवन में 16 बार भूख हड़तालें कीं। गांधी हिंदू-मुस्लिम एकता के सच्चे समर्थक थे। गांधी जी को देखकर भाईचारे और मुहब्बत की लहरें चलती थीं। उनका मानना था कि हिंसा और नफरत किसी समस्या का समाधान नहीं कर सकते हैं। हम सभी हिंदू, मुस्लिम, सिख और इसाई भारत माता के बेटे बेटियां हैं.
बापू महिला समानता के सबसे बड़े पैरोकार थे। उनका कहना था कि जब तक मानवता का पचास प्रतिशत हिस्सा यानि औरतें आजाद नहीं होतीं, तब तक भारत आजाद नहीं हो सकता। उनका मानना था कि बिना श्रम की रोटी चोरी की रोटी है। सत्य, अहिंसा, सदाचार, प्रेम और भाईचारा उनके सिद्धांत थे। वे कहते थे- ‘हम अलगअलग रह सकते हैं, मगर हम एक ही वृक्ष की पत्तियां हैं।

गांधी जी हमारे देश के बहुत बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। 30 जनवरी 1948 को सायं 5 बजकर 17 मिनट पर एक साम्प्रदायिक नाथूराम गोडसे ने प्रार्थना के लिए जाते निहत्थे शांतिदूत और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी यानि बापू यानि राष्ट्रपिता की बेदर्दी से हत्या कर डाली। कहा जाता है कि गोडसे ने गांधी जी की हत्या सावरकर की योजना के अनुसार की थी ।
गांधी जी एक ऐसे भारत का ख्वाब देखते थे, जहां कोई गरीब न हो, कोई अमीर न हो, सब तरह की हिंसा का खात्मा हो, सब जगह आजादी की बयार बहे,सबको रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाय, प्राकृतिक संसाधनों पर सबका अधिकार हो और इनका प्रयोग सबके विकास और समृद्धि के लिए किया जाये।
भारतीयता और हिंदुस्तानियत बापू के अंदर कूट-कूट कर भरी हुई थी। वे कहते थे- “आजाद भारत में किसी धर्म का नहीं, हिंदुस्तानियों का राज होगा। हिंदू- मुस्लिम एकता से ही सच्चा स्वराज्य आयेगा। हम हिंदू मुस्लिम नहीं भारतीय यानी हिंदुस्तानी हैं। मैं अपने खून की कीमत पर भी हिंदू- मुस्लिम एकता की रक्षा करूंगा। मैं हिंदू नहीं हिंदुस्तानी हूं. ”
सच में यह गांधी के सपनों का हिंदुस्तान नहीं है। यहां जातिवाद, साम्प्रदायिकता, छल-कपट और झूठ, भाईभतीजावाद, बेईमानी, भ्रष्टाचार, खुदगर्जी, शोषण, अन्याय, भेदभाव और गैरबराबरी, व धर्मांधताओं की विकृतियां उग आयी हैं और हम इनके गुलाम हो गये हैं, और आज फिर ‘जिसकी लाठी- उसकी भैंस’ वाली मानसिकता सिर उठा रही है। आदमी के बीच दूरियां बढ़ी हैं। यह देश बनाते बनाते और बिगड़ता जा रहा है।
गांधी राजनीति में धर्म का इस्तेमाल करने के विरोधी थे, वे एक धार्मिक विचारों के व्यक्ति थे, मगर वे कहीं से भी साम्प्रदायिक नहीं थे। वे साम्प्रदायिकता के सबसे बड़े दुश्मन थे।
हालांकि गांधी के दर्शन से पूरी पूरी सहमत नहीं हुआ जा सकता। वे सनातन धर्म और वर्णों के बने रहने में विश्वास करते थे। वे दुनिया के आधुनिकतम विचारों के प्रतिनिधि नहीं थे। वे समाजवादी व्यवस्था और विचारधारा में विश्वास नहीं रखते थे। वे समाजवाद को “लाल तबाही” कहा करते थे। वे पूंजीपतियों को धन दौलत का ट्रस्टी मानते थे।


फिर भी गांधी एक महान आत्मा थे। उनकी कथनी और करनी में बहुत फ़र्क नहीं था, जो कहते वही करते थे। उन्होंने अपने व्यक्तित्व से देश और दुनिया के करोड़ों लोगों को प्रभावित किया था। वे एक अमर व्यक्तित्व के मालिक आज भी बने हुए हैं।
वर्तमान समय में हमारी सरकार और उसके संगठन, गांधी की विचारधारा पर हमले कर रहे हैं, उनकी प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। गांधी को गालियां दी जा रही हैं, गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का महिमामंडन किया जा रहा है। गांधी के समावेशी चिंतन पर हमला जारी है। ये हमलावर सांप्रदायिक लोग हैं और वे भारत के संविधान, जनतंत्र, गणतंत्र, आजादी और अल्पसंख्यकों पर हमले कर रहे हैं। इनके हमलावर तेवरों से देश की एकता और अखंडता को गंभीर खतरे पैदा हो गए हैं। ऐसे में हमें गांधी की विचारधारा को बचाना है। जनता के सामने उनकी प्रासंगिकता को स्पष्ट करना है, साबित करना है और जनता को बताना होगा कि इस देश की रक्षा, इस देश के किसानों, नौजवानों, महिलाओं, आजादी, गणतंत्र, जनतंत्र, संविधान, धर्मनिरपेक्षता की रक्षा, गांधी की विचारधारा और उनके मूल्यों से की जा सकती है। गोडसे और सांप्रदायिकता के विचारों से नहीं।
ऐसे में धर्मनिरपेक्षता एवं जनतंत्र पर आस्था रखने वाले राजनीतिज्ञों, लेखकों, गायकों, कवियों, कहानीकारों निबंधकारों, साहित्यकारों, मीडियाकर्मियों और सांस्कृतिकर्मियों का दायित्व और बढ़ जाता है। उन्हें गांधी के विचारों की प्रासंगिकता के बचाव के अभियान में अग्रणी भूमिका निभानी पड़ेगी और देश के शत्रुओं को करारा जवाब देना पड़ेगा। देश के विमर्श को जनवादी धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक, समाजवादी, बहुलतावादी और सर्व समावेशी बनाना पड़ेगा। हम यहां पर यही कहेंगे….

….गांधी के हत्यारे
ना हमारे हैं ,ना तुम्हारे हैं !

….गांधी हम शर्मिंदा हैं
तेरे कातिल जिंदा हैं !

(प्रस्तुत लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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