विरोध: मोहकमपुर–आशारोड़ी एलिवेटेड रोड पर बवाल, विकास की राह में उजड़ने का डर
देहरादून। राजधानी में यातायात का दबाव कम करने के लिए प्रस्तावित मोहकमपुर–आशारोड़ी एलिवेटेड रोड अब विवादों में घिरती नजर आ रही है। परियोजना के रूट में बदलाव के आरोपों के बीच क्षेत्रवासियों ने विरोध का बिगुल फूंक दिया है। संघर्ष समिति का दावा है कि प्रस्तावित निर्माण की मौजूदा योजना से हजारों मकान, जमीन और परिवार प्रभावित हो सकते हैं। लोगों का आरोप है कि जिस परियोजना से शहर को जाम से राहत मिलने की उम्मीद है, उसी के कारण कई परिवारों के सामने अपने आशियाने खोने का खतरा खड़ा हो गया है।
मोहकमपुर–आशारोड़ी एलिवेटेड रोड संघर्ष समिति ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की सात अगस्त 2026 की अधिसूचना पर आपत्ति जताते हुए योजना पर पुनर्विचार की मांग की है। समिति से जुड़े लोगों ने विधानसभा के पास धरना देकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उनका कहना है कि परियोजना को मूल राजमार्ग के ऊपर से निकालने के बजाय आवासीय बस्तियों की ओर मोड़ने से बड़ी आबादी के प्रभावित होने की आशंका पैदा हो गई है।
भारत सरकार के राजपत्र संख्या-4205 और सात अगस्त 2026 की अधिसूचना का हवाला देते हुए समिति ने बताया कि राष्ट्रीय राजमार्ग-07 पर मोहकमपुर से आशारोड़ी तक करीब 12.7 किलोमीटर के हिस्से में एलिवेटेड रोड और शेष हिस्सों में हाईवे चौड़ा करने की योजना है। समिति के अनुसार, प्रस्तावित मार्ग मोहकमपुर रेलवे फाटक के निकट से गुजरते हुए कई आबादी वाले क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है। इनमें मोहकमपुर बस्ती, कंपनी बाग, योगीवाला फाटक, बीरपुर-पंजाबला, फ्रेंड्स एन्क्लेव, फ्रेंड्स कॉलोनी और रिस्पना नदी के बाद स्थित रेलवे कॉलोनी सहित आसपास की बस्तियों का उल्लेख किया गया है। प्रस्तावित एलिवेटेड रोड को सॉलिटेयर होटल के पास अजाबपुर फ्लाईओवर से जोड़ने की बात कही गई है।
संघर्ष समिति का दावा है कि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की ओर से कुछ भवनों पर निशान लगाए जाने के बाद लोगों की चिंता बढ़ गई है। हालांकि, वास्तव में कितने मकान अधिग्रहण या निर्माण की जद में आएंगे, इसका आधिकारिक आंकड़ा सामने आना जरूरी है।
विरोध का सबसे बड़ा कारण परियोजना के रूट में कथित बदलाव है। संघर्ष समिति का कहना है कि पहले एलिवेटेड रोड को मुख्य हाईवे के ऊपर से निकालने की योजना थी, लेकिन बाद में इसका मार्ग आवासीय क्षेत्रों की ओर कर दिया गया। समिति ने सवाल उठाया है कि यदि मूल सड़क के ऊपर से निर्माण संभव था, तो ऐसी योजना में बदलाव क्यों किया गया जिससे बड़ी संख्या में परिवारों के प्रभावित होने की आशंका पैदा हो गई।
समिति ने वर्ष 2004-05 में इसी क्षेत्र में सड़क निर्माण के दौरान मकानों पर लाल निशान लगाए जाने का भी जिक्र किया है। उसके अनुसार, उस समय स्थानीय लोगों के विरोध के बाद योजना वापस लेनी पड़ी थी। अब दोबारा निशान लगाए जाने से क्षेत्रवासियों में पुराने घटनाक्रम की पुनरावृत्ति का डर है।
लोगों की मांग है कि परियोजना का अंतिम रूट तय करने से पहले वैकल्पिक मार्गों का तकनीकी परीक्षण कराया जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि मौजूदा हाईवे के ऊपर से एलिवेटेड रोड बनाने का विकल्प क्यों नहीं अपनाया जा सकता।
क्षेत्रवासियों का आरोप है कि उन्हें परियोजना की जानकारी समय रहते नहीं दी गई। लोगों के अनुसार, करीब एक सप्ताह पहले जब चिह्नित मकानों पर निशान लगाए जाने लगे, तब उन्हें संभावित खतरे का पता चला। समिति ने सवाल उठाया है कि इतने बड़े निर्माण से पहले प्रभावित परिवारों को जानकारी देने, उनकी आपत्तियां सुनने और योजना का विवरण सार्वजनिक करने की व्यवस्था क्यों नहीं की गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई परिवारों ने जीवनभर की कमाई खर्च कर अपने मकान बनाए हैं। यदि भवन टूटते हैं तो उनके सामने रहने की नई जगह तलाशने और दोबारा घर बनाने का संकट खड़ा हो सकता है। ऐसे में केवल सड़क निर्माण की उपयोगिता ही नहीं, बल्कि प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और मुआवजे की व्यवस्था भी स्पष्ट होनी चाहिए। एलिवेटेड रोड जैसी परियोजनाएं शहर में यातायात सुधारने और आवागमन सुगम बनाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं, लेकिन उनका रूट तय करते समय स्थानीय आबादी पर पड़ने वाले प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मोहकमपुर से आशारोड़ी के बीच उठे विरोध ने परियोजना की योजना प्रक्रिया, जनसुनवाई और पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
संघर्ष समिति ने संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लेख करते हुए कहा है कि प्रभावित परिवारों की चिंताओं को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। लोगों की मांग है कि परियोजना से संबंधित नक्शा, भवनों पर निशान लगाने का आधार, भूमि अधिग्रहण की स्थिति और संभावित प्रभावित परिवारों का विवरण सार्वजनिक किया जाए।
मोहकमपुर–आशारोड़ी एलिवेटेड रोड संघर्ष समिति के मुख्य संयोजक सुशील कुमार ने परियोजना पर पुनर्विचार करने की मांग की है। समिति चाहती है कि अधिकारियों की ओर से प्रभावित क्षेत्र का स्थलीय निरीक्षण किया जाए, स्थानीय लोगों की आपत्तियां दर्ज हों और तकनीकी रूप से संभव वैकल्पिक रूट पर विचार किया जाए।
धरने में टीएस नेगी, धीरज सिंह रावत, पीके भटनागर, मुकेश कुमार शर्मा, राकेश पुरोहित, संतराम जायसवाल, एसएन चौहान, ऊषा पडवाल, प्रशांत कुमार, महेंद्र, सुरेश बहुगुणा, त्रिभुवन सिंह, पूनम कुकरेती, राजेंद्र प्रसाद, अर्जुन सिंह और बलराम प्रजापति सहित अन्य लोग शामिल रहे।
अब इस मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि क्या परियोजना की मौजूदा रूपरेखा में बदलाव की गुंजाइश है और क्या प्रभावित होने की आशंका झेल रहे परिवारों को समय रहते स्पष्ट जानकारी मिल पाएगी। सड़क निर्माण से शहर को राहत मिले, लेकिन इसकी कीमत स्थानीय परिवारों को अपने घर गंवाकर न चुकानी पड़े—यही इस विरोध का मूल मुद्दा बन गया है।

