आकलन: कांग्रेस में हरदा फैक्टर से सामूहिक नेतृत्व की रणनीति के बीच बढ़ती असहजता

आकलन: कांग्रेस में हरदा फैक्टर से सामूहिक नेतृत्व की रणनीति के बीच बढ़ती असहजता
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देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सामूहिक नेतृत्व और नई पीढ़ी के चेहरों को आगे बढ़ाने की रणनीति पर बढ़ती दिखाई दे रही है, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की सक्रियता ने पार्टी के भीतर एक अलग राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है। चुनाव में करीब चार माह का समय बचा है और इसी दौर में रावत ने अपनी धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा के जरिये जिस तरह राजनीतिक सक्रियता बढ़ाई है, उससे कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, टिकट वितरण और चुनावी रणनीति को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
कांग्रेस के सामने चुनौती सिर्फ भाजपा के खिलाफ चुनावी रणनीति तैयार करने की नहीं, बल्कि अपने ही वरिष्ठ नेताओं के बीच संतुलन बनाए रखने की भी है। रावत लंबे समय तक उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति के प्रमुख केंद्र रहे हैं। ऐसे में चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी समितियों और निर्णयों में उनकी भूमिका को लेकर उठते सवालों का असर पार्टी की आंतरिक राजनीति पर पड़ना स्वाभाविक माना जा रहा है। हरीश रावत की हालिया यात्रा को पार्टी के भीतर एक गुट द्वारा महज जनसंपर्क कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जा रहा। इसमें प्रदेश चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह समेत कांग्रेस के सात विधायकों की भागीदारी ने इसे राजनीतिक रूप से ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया। रावत ने यात्रा के जरिये अपने राजनीतिक आधार और समर्थक नेताओं की मौजूदगी का संदेश दिया। वहीं, पार्टी नेतृत्व की ओर से चुनावी रणनीति को सामूहिक नेतृत्व के आधार पर आगे बढ़ाने की कोशिशों के बीच यह सक्रियता कांग्रेस के भीतर विभिन्न शक्ति-केंद्रों की मौजूदगी को भी सामने लाती है।
विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने अलग-अलग समितियों और जिम्मेदारियों के जरिये सामूहिक नेतृत्व का ढांचा तैयार किया है। इसी प्रक्रिया में हरीश रावत की भूमिका को लेकर उनके समर्थकों के बीच असंतोष की चर्चा रही है। रावत की राजनीति का आधार लंबे समय से प्रदेश संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच उनका संपर्क रहा है। यही वजह है कि चुनाव के समय उनकी सक्रियता को पार्टी की आंतरिक राजनीति से अलग करके देखना आसान नहीं है। हालांकि कांग्रेस के भीतर एक दूसरा दृष्टिकोण भी है। पार्टी नेतृत्व चुनाव को किसी एक चेहरे या गुट के बजाय सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में आगे बढ़ाना चाहता है। ऐसे में रावत की सक्रियता और हाईकमान की रणनीति के बीच तालमेल किस रूप में बनता है, यह आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण रहेगा।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल को हरीश रावत के करीब माना जाता रहा है। लेकिन चुनावी रणनीति में हाईकमान की प्राथमिकताओं को लागू करने की जिम्मेदारी प्रदेश संगठन पर भी है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि आने वाले महीनों में प्रदेश अध्यक्ष दोनों धाराओं के बीच किस तरह संतुलन साधते हैं। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य की राजनीति को भी इस पूरे समीकरण में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्हें पार्टी के भीतर व्यापक स्तर पर समन्वय रखने वाले नेता के रूप में देखा जाता है, लेकिन चुनावी टिकटों और उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया में अलग-अलग नेताओं के राजनीतिक प्रभाव का वास्तविक परीक्षण तभी होगा, जब सीटवार मंथन शुरू होगा। कांग्रेस की मौजूदा आंतरिक राजनीति का सबसे बड़ा परीक्षण टिकट वितरण के समय होना है। संभावित उम्मीदवारों को लेकर अलग-अलग नेताओं के समर्थकों की दावेदारी सामने आने लगी है। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व की पसंद, प्रदेश संगठन की राय और वरिष्ठ नेताओं के प्रभाव के बीच संतुलन बनाना पार्टी के लिए महत्वपूर्ण रहेगा। हरीश रावत की हालिया सक्रियता ने यह संकेत जरूर दिया है कि वह चुनावी प्रक्रिया से खुद को अलग रखने के पक्ष में नहीं हैं। अब सवाल यह है कि पार्टी उनके अनुभव और राजनीतिक प्रभाव को किस भूमिका में इस्तेमाल करती है और टिकट चयन जैसे संवेदनशील फैसलों में उनके प्रभाव की सीमा कितनी रहती है।
पूरे घटनाक्रम को केवल हरीश रावत बनाम कांग्रेस हाईकमान के रूप में देखना तस्वीर को अधूरा कर सकता है। वास्तविक चुनौती पार्टी के सामने यह है कि अलग-अलग वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और समर्थक समूहों को एक साझा चुनावी रणनीति में किस तरह जोड़ा जाए। रावत की यात्रा ने पार्टी के भीतर मौजूद मतभेदों और अलग-अलग राजनीतिक केंद्रों की चर्चा को जरूर फिर सामने ला दिया है। अब कांग्रेस नेतृत्व के सामने दोहरी जिम्मेदारी है—एक ओर सामूहिक नेतृत्व की अपनी रणनीति को आगे बढ़ाना और दूसरी ओर वरिष्ठ नेताओं की भूमिका तथा उनके समर्थक आधार को चुनावी अभियान से जोड़कर रखना। चुनावी कैलेंडर तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में आने वाले महीनों में संगठनात्मक नियुक्तियों, टिकट चयन, चुनाव अभियान और वरिष्ठ नेताओं की भूमिका से यह स्पष्ट होगा कि कांग्रेस अपने भीतर मौजूद विभिन्न राजनीतिक धाराओं को किस हद तक एक मंच पर ला पाती है।

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