विवाद: हल्द्वानी के हवन पर छिड़ा सियासी संग्राम, दलित अस्मिता बनाम ‘शुद्धिकरण’ की राजनीति शुरू

विवाद: हल्द्वानी के हवन पर छिड़ा सियासी संग्राम, दलित अस्मिता बनाम ‘शुद्धिकरण’ की राजनीति शुरू
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हल्द्वानी के  रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद हुए हवन और शुद्धिकरण को लेकर उत्तराखंड की सियासत गरमा गई है। स्थानीय स्तर पर शुरू हुआ यह विवाद अब कांग्रेस और भाजपा के बीच तीखे राजनीतिक टकराव का रूप ले चुका है। कांग्रेस जहां इसे दलित अस्मिता, सम्मान और छुआछूत से जोड़कर भाजपा पर निशाना साध रही है, वहीं भाजपा इसे कांग्रेस का ‘झूठा नैरेटिव’ बताते हुए पलटवार कर रही है। दोनों दलों के आरोप-प्रत्यारोप से साफ है कि यह मुद्दा फिलहाल आसानी से शांत होने वाला नहीं है।

विवाद का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि जिस नेता की रैली के बाद हवन हुआ, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे देश के प्रमुख दलित नेताओं में गिने जाते हैं। कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम को केवल स्थानीय धार्मिक गतिविधि न मानकर सामाजिक सम्मान से जुड़ा मुद्दा बना दिया है। पार्टी की रणनीति इसे राष्ट्रीय स्तर पर दलित सम्मान, सामाजिक न्याय और कथित छुआछूत के सवाल से जोड़कर भाजपा को घेरने की दिखाई दे रही है।

कांग्रेस पहले से ही संविधान, सामाजिक न्याय और जातिगत जनगणना जैसे मुद्दों पर केंद्र सरकार और भाजपा के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाए हुए है। ऐसे में हल्द्वानी का घटनाक्रम उसके लिए अपने इस राजनीतिक विमर्श को उत्तराखंड की जमीन पर मजबूत करने का अवसर बन गया है। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की ओर से मामले में एफआईआर की मांग और घटना को छुआछूत के आधुनिक रूप से जोड़कर उठाया जाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

भाजपा का पलटवार—धार्मिक अनुष्ठान को जाति से जोड़ना गलत

दूसरी ओर भाजपा इस मामले में रक्षात्मक होने के बजाय कांग्रेस पर ही तीखा हमला कर रही है। भाजपा और हवन कराने वाले आयोजकों की ओर से कहा जा रहा है कि अनुष्ठान का उद्देश्य किसी व्यक्ति या जाति का अपमान करना नहीं था। उनका तर्क है कि रामलीला मैदान जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल पर राजनीतिक रैली के बाद फैली गंदगी, कचरे और गुटखे आदि की सफाई तथा राजनीतिक नारों के बाद धार्मिक परंपरा के अनुसार हवन किया गया।

भाजपा नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस जानबूझकर सामान्य धार्मिक अनुष्ठान को जातिगत विवाद का रंग दे रही है। पार्टी के कई नेताओं ने ऐसे स्थानीय लोगों के बयान और वीडियो भी सामने रखे हैं, जिनमें अनुष्ठान में शामिल लोगों की ओर से स्वयं को दलित बताते हुए धार्मिक आस्था और सफाई के उद्देश्य से हवन किए जाने की बात कही गई है। भाजपा इसी आधार पर कांग्रेस के छुआछूत संबंधी आरोपों को खारिज करने की कोशिश कर रही है।

दलित वोट बैंक पर नजर

इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका चुनावी गणित भी है। उत्तराखंड में आने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए दलित मतदाताओं का समर्थन दोनों प्रमुख दलों के लिए महत्वपूर्ण है। कांग्रेस इस घटनाक्रम को दलित सम्मान और सामाजिक न्याय के बड़े विमर्श से जोड़कर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा अपने सामाजिक समावेश और दलित हितैषी छवि को सामने रखकर कांग्रेस के आरोपों को कमजोर करना चाहती है।

भाजपा की ओर से डॉ. भीमराव आंबेडकर और बाबू जगजीवन राम के संदर्भ में कांग्रेस के पुराने राजनीतिक इतिहास को भी बहस में लाया जा रहा है। साथ ही राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और केंद्र सरकार में दलित एवं आदिवासी प्रतिनिधित्व का हवाला देकर भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि सामाजिक सम्मान और राजनीतिक भागीदारी के मामले में वह कांग्रेस से आगे है।

स्थानीय विवाद से राष्ट्रीय नैरेटिव तक

हल्द्वानी का यह विवाद अब केवल रामलीला मैदान में हुए एक धार्मिक अनुष्ठान का सवाल नहीं रह गया है। इसके दोनों पक्षों ने इसे अपने व्यापक राजनीतिक विमर्श से जोड़ दिया है। कांग्रेस के लिए यह सामाजिक न्याय, दलित सम्मान और छुआछूत के खिलाफ संघर्ष का मुद्दा है, जबकि भाजपा इसे धार्मिक आस्था के राजनीतिकरण और समाज में जातिगत विभाजन पैदा करने की कोशिश के रूप में पेश कर रही है।

यही वजह है कि दोनों दल इस मुद्दे को छोड़ने के बजाय लगातार आक्रामक हो रहे हैं। कांग्रेस जहां इसे राष्ट्रीय स्तर तक ले जाने की कोशिश में है, वहीं भाजपा कांग्रेस के आरोपों को ‘राजनीतिक लाभ के लिए गढ़ा गया नैरेटिव’ बताकर जवाब दे रही है।

दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम के पीछे आने वाले चुनावों का राजनीतिक गणित भी दिखाई दे रहा है। कांग्रेस भाजपा के व्यापक हिंदू सामाजिक आधार में सामाजिक न्याय और जातिगत पहचान के सवाल के जरिए सेंध लगाने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, धार्मिक आस्था और अपने सामाजिक समावेश के दावे के जरिए इस चुनौती का मुकाबला करना चाहती है।

इस लिहाज से हल्द्वानी का हवन अब महज एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति में ‘सामाजिक न्याय बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के बड़े विमर्श का नया राजनीतिक अखाड़ा बनता दिखाई दे रहा है।

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