पेशावर कांड: जब गढ़वाली सैनिकों ने निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से कर दिया था इनकार

पेशावर कांड: जब गढ़वाली सैनिकों ने निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से कर दिया था इनकार
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साम्प्रदायिक एकता एवं देशभक्ति की मिसाल है, पेशावर विद्रोह

अनंत आकाश
पेशावर विद्रोह इतिहास में पेशावर कांड के नाम से जाना जाता है ,जब बीर गढ़वाली सैनिकों ने चंद्र सिंह भंडारी (गढ़वाली) के नेतृत्व में पेशावर के किस्साखानी बाजार(अब पाकिस्तान में) में देश की आजादी के आन्दोलन की कड़ी में सत्याग्रह कर रही पठान जनता पर गोली चलाने से इन्कार कर दिया था।

23 अप्रैल 1930 को सेना के कप्तान रिकेट ने पूरी गढ़वाली पल्टन की टुकड़ी को उक्त आन्दोलन को साम्प्रदायिक आधार पर कुचलने के लिए किस्साखानी बाजार कूच करने का आदेश दिया। कप्तान ने जैसे ही निरीह जनता पर फायर के आदेश दिये तो वहीं खड़े हवलदार चंद्र सिंह गढ़वाली ने सैनिकों को आदेश दिया- ‘गढ़वाली सीज फायर !’ उनकी सूझ-बूझ व दूरदर्शिता ने न केवल एक बड़ा नरसंहार होने से रोक दिया, बल्कि हिन्दू मुस्लिम एकता तथा देशभक्ति की अविस्मरणीय मिसाल पेश की, जो उसके बाद शहीदे आजम भगतसिंह एवं उनके साथियों ने भी पेश की। उस घटना के बाद से ही चंद्र सिंह भंडारी का नाम चंद्र सिंह ‘गढ़वाली’ पड़ गया और उसके साथ ‘वीर’ की उपाधि भी जुड़ गयी।


पेशावर सैनिक विद्रोह से पूर्व 1857 के विद्रोह से इस घटना की शुरूआत हो चुकी थी। हालांकि पेशावर विद्रोह के सैनिकों को पता था कि इसका परिणाम उनके लिए क्या होने वाला है ? किन्तु इस घटना से अंग्रेजी शासन की चूलें हिल गयीं । गढ़वाली की बगावत ने हिंदुस्तान से लेकर लंदन तक अंग्रेजों की नींद उड़ाकर रख दी। आनन फानन में विद्रोही सैनिकों की गिरफ्तारी व मुकदमों का सिलसिला चला, जिसका वीर सैनिकों ने चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में बहादुरी से मुकाबला किया। देश की मुक्तिकामी जनता ने उनका हर संभव सहयोग किया। इस घटना के बाद आज भी गढ़़वाली सैनिकों का नाम दोनों देशों में बड़े ही आदर से लिया जाता है। चन्द्र सिंह गढ़़वाली आज़ भी उनके हीरो हैं। पेशावर विद्रोह के सैनिकों ने लंबी सजा काटने के बाद भी देश के लिए अपने कर्तव्य एवं संघर्ष को नहीं छोड़ा। वे चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में आजादी की मुख्यधारा से सदैव जुड़े रहे। वे महात्मा गांधी से प्रेरणा लेते थे तथा कम्युनिस्टों से भी। भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर आजादी के अनेक मुक्ति आंदोलनों में उनकी अहम भूमिका की लम्बी फैहरिस्त है।

बाद में चंद्र सिंह गढ़़वाली ने कम्युनिस्टों के साथ काम करने का निर्णय लिया तथा उन्होंने उत्तराखंड की जनता की कई बुनियादी लड़ाईयां लड़ीं। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली आजीवन कम्युनिस्ट रहे। उन्होंने टिहरी राजशाही के खात्मे में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 1979 में देश की आजादी के इस महान नेता कामरेड चंद्र सिंह गढ़़वाली ने दिल्ली सीपीआई(एम) कार्यालय में अंतिम सांस ली।

उनकी अंत्येष्टि में देश की जानीमानी हस्तियों ने हिस्सेदारी की। कामरेड चंद्र सिंह गढ़़वाली व उनके साथियों के ऐतिहासिक योगदान को पीढ़ी दर पीढ़ी याद किया जाता रहेगा ।

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