ख़ास ख़बर: क्या पत्नी की मौत के बाद मायके से मिली संपत्ति पर होता है पति का हक? हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

ख़ास ख़बर: क्या पत्नी की मौत के बाद मायके से मिली संपत्ति पर होता है पति का हक? हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला
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अमरावती। अक्सर यह माना जाता है कि पत्नी के नाम पर मौजूद किसी भी संपत्ति पर उसके पति का स्वाभाविक अधिकार होता है, लेकिन आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने एक बेहद अहम फैसले से इस धारणा को पूरी तरह साफ कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि मायके से मिली प्रॉपर्टी पर पति का कोई कानूनी हक नहीं होता है। हाई कोर्ट के इस फैसले के मुताबिक, अगर किसी हिंदू महिला को उसके माता-पिता से कोई संपत्ति विरासत में मिलती है और दुर्भाग्यवश बिना वसीयत किए उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उस संपत्ति पर उसके पति या ससुराल वालों का कोई भी दावा नहीं माना जाएगा।

निसंतान महिला की मौत पर किसे मिलेगी संपत्ति?
इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस तरलाडा राजशेखर राव ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15(2)(क) का प्रमुखता से हवाला दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर किसी महिला को संपत्ति उसके पिता या माता की तरफ से मिली है और उसकी मृत्यु बिना किसी संतान के हो जाती है, तो ऐसी स्थिति में वह संपत्ति वापस उसके पिता या मायके के उत्तराधिकारियों के पास ही जाएगी। इस तरह की विरासत वाली प्रॉपर्टी पर मृत महिला के पति का कोई अधिकार नहीं बनता है। कानून का हवाला देते हुए अदालत ने संपत्ति मायके पक्ष को लौटाने का स्पष्ट आदेश सुनाया।

आखिर क्या था प्रॉपर्टी से जुड़ा यह पूरा विवाद?
यह पूरा कानूनी विवाद एक पारिवारिक संपत्ति से शुरू हुआ था, जिसमें एक बुजुर्ग महिला ने साल 2002 में अपनी एक पोती को उपहार के तौर पर अपनी संपत्ति दी थी। हालांकि, साल 2005 में उस पोती की मौत हो गई और उसकी कोई संतान भी नहीं थी। पोती के निधन के बाद उस बुजुर्ग महिला ने वह प्रॉपर्टी अपनी दूसरी पोती के नाम कर दी। महिला की मृत्यु के बाद जब दूसरी पोती ने कानूनी रूप से संपत्ति अपने नाम करवाने की प्रक्रिया शुरू की, तो इसे पहले राजस्व अधिकारी ने स्वीकार कर लिया। लेकिन इसके बाद मृत पोती के पति ने इस आदेश को चुनौती दे दी और निचले स्तर पर अपने पक्ष में आदेश हासिल कर लिया। इसके खिलाफ दूसरी पोती ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाई कोर्ट ने किसे माना प्रॉपर्टी का असली वारिस?
मामला जब आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट पहुंचा, तो दूसरी पोती ने याचिका दायर कर दलील दी कि कानून के मुताबिक उसकी मृत बहन के पति का इस संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं बनता है। उसने तर्क दिया कि यह संपत्ति ननिहाल पक्ष से आई थी और मृत बहन की कोई संतान भी नहीं थी। हाई कोर्ट ने इस मजबूत दलील से पूरी तरह सहमति जताई और साफ किया कि पति का इस संपत्ति पर कोई हक नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पति को उस उपहार को रद्द करने की वैधता पर सवाल उठाने का भी कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि उसे अपनी पत्नी से इस संपत्ति पर कोई कानूनी अधिकार प्राप्त ही नहीं हुआ था। अंत में हाई कोर्ट ने निचले प्राधिकरण का आदेश रद्द करते हुए संबंधित तहसीलदार को सख्त निर्देश दिया कि संपत्ति को तुरंत याचिकाकर्ता (दूसरी पोती) के नाम किया जाए।

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