मुद्दा: जन-धन और संसाधनों की बर्बादी के सिवा युद्धरत देशों को क्या हासिल हुआ?
अमरीकी राष्ट्रपति ने युद्ध की समाप्ति के संकेत दिए हैं, लेकिन जब तक वह घोषणा नहीं करते और अपनी सेनाओं की वापसी का आदेश नहीं देते, तब तक सब कुछ अनिश्चित और अस्थिर है, क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप की फितरत ही ऐसी है। दरअसल ईरान युद्ध के आयाम बिल्कुल बदल चुके हैं। अब यह ‘तेल-गैस युद्ध’ के खौफनाक, विध्वंसक चरण में प्रवेश कर चुका है। यदि अमरीका वाकई युद्ध समेटना चाहता है, तो पेंटागन ने अमरीकी कांग्रेस (संसद) से 200 अरब डॉलर, यानी 18.64 लाख करोड़ रुपए, के अतिरिक्त फंड की मांग क्यों की है? यह बेहद मौजू सवाल है। यदि भारत के शेयर और कारोबारी बाजार की बात करें, तो युद्ध के 20 दिनों में ही 37 लाख करोड़ रुपए स्वाहा हो चुके हैं। बीती 19 मार्च को एक ही दिन में करीब 14 लाख करोड़ रुपए डूब चुके हैं। ये सिर्फ वित्तीय सेवाओं, संस्थानों और कॉरपोरेट के ही नुकसान हैं। समग्र नुकसान अनंत, असीम हो सकता है। विशेषज्ञों के आकलन हैं कि यदि कच्चे तेल की कीमतें, लंबे वक्त तक, 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहीं, तो वित्त वर्ष 2027 में देश की जीडीपी बढ़ोतरी और कॉरपोरेट आय पर बुरा असर पडऩा तय है। भारत 19 लाख करोड़ रुपए का निर्यात खाड़ी देशों को करता है, जो युद्ध के कारण बाधित है, जाहिर है कि अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। ईरान के जिस ‘साउथ पार्स गैस प्लांट’ पर इजरायल ने विनाशकारी हमला किया था, वह 1800 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस का सर्वाधिक उत्पादन करता है। पार्स अकेले ही 13 लंबे सालों तक दुनिया की गैस-जरूरतों की आपूर्ति कर सकता था।
प्राकृतिक गैस उत्पादन में ईरान, अमरीका और रूस के बाद, तीसरा सबसे बड़ा गैस उत्पादक देश है। प्राकृतिक गैस ‘ईरान की लाइफलाइन’ रही है, क्योंकि वहां 80 फीसदी बिजली प्राकृतिक गैस से ही बनाई जाती रही है। उस प्लांट को जला कर खाक कर दिया गया है। चूंकि इस क्षेत्र में कतर भी साझेदार है, लिहाजा वह भी इतना प्रभावित हुआ है कि उसने एलएनजी का उत्पादन ही बंद कर दिया है। सबसे भीषण हमला कतर के ‘रास लफान’ एलएनजी प्लांट पर ईरान ने किया। नतीजतन कतर की गैस निर्यात क्षमता 17 फीसदी नष्ट हो गई है। भारत कतर से 47 फीसदी एलएनजी और 25 फीसदी रसोई गैस (एलपीजी) लेता रहा है। चीन और जापान भी इसी पर निर्भर रहे हैं। कतर से ही एशिया और यूरोप के अन्य देशों को भी गैस आपूर्ति होती रही है। यदि एलएनजी नहीं मिलेगी, तो यूरिया खाद का उत्पादन भी संकट में पड़ सकता है। यदि खाद की कमी होगी, तो फसलें भी कम होंगी। इन विनाशकारी हमलों ने ऊर्जा-संकट के साथ-साथ खाद्य-संकट की संभावनाएं भी पैदा कर दी हैं। ईरान ने ‘साउथ पार्स’ हमले से तिलमिला कर ही इजरायल समेत 9 देशों पर विध्वंसक मिसाइलों से हमले किए। यदि युद्ध यहीं थम जाता है, तो तबाह तेल-गैस ठिकानों, प्रतिष्ठानों और रिफाइनरियों के पुनर्निर्माण में कमोबेश 3-5 साल का वक्त लगेगा। अरबों रुपए खर्च करने पड़ेंगे। सबसे अहम यह है कि इस कालखंड में युद्ध नहीं होना चाहिए। अमरीका-इजरायल और ईरान ने इन बर्बादियों से हासिल क्या किया? मिट्टी-मलबा, खंडहर, बंजर जमीन और धधक कर खाक होते तेल-गैस प्लांट३! 2003 के ‘इराक युद्ध’ में भी अमरीका ने इसी तरह कई ऊर्जा-संयंत्रों को तबाह, बर्बाद किया था। युद्ध के दो साल बाद तक भी उनकी मरम्मत नहीं हो सकी थी।

