मुद्दा: केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि देश तेल-गैस के संकट में घिरना नहीं चाहिए
भारत 2019 तक ईरान से कच्चा तेल आयात करता था। उसकी आपूर्ति में परिवहन और बीमा निरूशुल्क होते थे। ‘रुपए’ की मुद्रा में तेल की आपूर्ति होती थी और ईरान के करीब 60,000 करोड़ रुपए भारतीय बैंकों में जमा थे। अमरीका ने ईरान पर पाबंदियां थोपीं, तो भारत पर भी दबाव बनाया गया कि वह ईरान से तेल न खरीदे। हमने अमरीका का आदेश मान लिया और ईरान से तेल का आयात बंद कर दिया। उसी तरह रूस के तेल को काफी कम किया गया। अब संकट के दौर में ईरान और रूस दोनों को ‘पुरानी दोस्ती’ की दुहाई दी जा रही है। वे दोस्ती निभा भी रहे हैं। आभार ईरान और रूस! अब सरकार बार-बार दावे कर रही है कि एलपीजी की कोई कमी नहीं है, तो कुछ सवाल मौजू लगते हैं। जिनके घरों में पाइपलाइन से पीएनजी सप्लाई की जाती है, उन्हें एलपीजी कनेक्शन से वंचित क्यों किया जा रहा है? ऐसे कनेक्शन 1.62 करोड़ हैं। देश की आबादी में चुटकी भर संख्या३! बीती 13 मार्च को 88.8 लाख बुकिंग कराई गई, जबकि एक दिन की औसत बुकिंग 55 लाख रही है। क्या पूरी ‘दहशतपूर्ण बुकिंग’ है? राजधानी दिल्ली में ही होटल, रेस्तरां और ढाबों में इंडक्शन चूल्हों और डीजल की भ-ियों पर खाना क्यों बनने लगा है? सरकार ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) के जरिए वैकल्पिक ईंधन की इजाजत क्यों दी है? लोगों ने घरों की छतों पर चूल्हा रख कर लकड़ी और कोयले पर खाना पकाना क्यों शुरू कर दिया है?
जहरीले प्रदूषण को आमंत्रण और पर्यावरण का छिलना शुरू! एक पेशेवर सवाल यह है कि यदि एलपीजी का कोई संकट नहीं है, तो गैस डीलरों ने फोन क्यों बंद कर रखे हैं? हॉकर के फोन भी बंद हैं, क्यों? प्रधानमंत्री मोदी आजकल चुनावी जनसभाओं में व्यस्त हैं। वह बार-बार देश का आह्वान कर रहे हैं कि अफवाहों में मत आएं और अफवाहें फैलाएं भी नहीं। देश करीब 12 साल पहले कांग्रेस और विपक्ष को खारिज कर चुका है। लगातार तीन बार संसदीय जनादेश भाजपा-एनडीए को मिला है। नतीजतन मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री हैं। 12 साल एक लंबा वक्त होता है, लिहाजा अब प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की जिम्मेदारी है कि देश संकट में घिरना नहीं चाहिए। यदि संकट वैश्विक है, तो देश को विश्वास में लेना चाहिए कि प्रयास किए जा रहे हैं, लिहाजा प्रधानमंत्री का देश को संबोधित करना अनिवार्य है। सरकार कबूल करे कि तेल-गैस का संकट है और उससे पार पाने की कोशिशें की जा रही हैं। प्रधानमंत्री ने कोरोना महामारी के दौरान कई बार देश को संबोधित किया था। अंततरू कोरोना पराजित हुआ। यदि अब गैस एजेंसियों के बाहर जमा भीड़ कांग्रेस, वामपंथी, सपाई कार्यकर्ता या समर्थक हैं और गैस वाकई उपलब्ध है, तो उस भीड़ का संकट हल क्यों नहीं किया जा रहा? भीड़ कुछ हजार ही होगी। आखिर वे भी देश के नागरिक और एलपीजी के पंजीकृत उपभोक्ता हैं! आगामी दो-तीन माह के दौरान बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम, पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव हैं। इन राज्यों में कुल 18 करोड़ मतदाता हैं और 11 लाख से अधिक गैस सिलेंडर रोजाना सप्लाई किए जाते हैं। प्रधानमंत्री और भाजपा को एहसास होगा कि मतदाता का इस समय मानस क्या है? यदि देश में तेल-गैस का कोई भी संकट नहीं है, तो स्पष्ट बताएं। कांग्रेस को कोसने से संकट कम नहीं होने वाला है, प्रधानमंत्री जी! मीडिया में खबरें छप रही हैं कि कई जगहों पर रसोई गैस के लिए लंबी-लंबी कतारें लोगों की लग रही हैं। विशेषकर शहरी क्षेत्रों में रसोई गैस की कमी की खबरें आ रही हैं।
