मुद्दा: क्या भारत की संस्कृति पर कालिख पोतने के लिए किए गए ईसाई आस्थाओं पर हमले?

मुद्दा: क्या भारत की संस्कृति पर कालिख पोतने के लिए किए गए ईसाई आस्थाओं पर हमले?
Spread the love

 

‘मैरी क्रिसमस’ का दिन बीत गया, लेकिन कटुता, हिंसा और आहत के कई अवशेष छोड़ गया। कुछ सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने घोर अल्पसंख्यक ईसाइयों के पवित्र गिरजाघरों पर हमले किए, ‘क्रिसमस ट्री’ को जमीन पर ला पटका और मॉल में सजे सांता क्लॉज के लिबास, टोपी, मुखौटों को खंडित किया। ये भारत की धार्मिक सहिष्णुता, स्वतंत्रता और भावनाओं पर चोट करने की हरकतें थीं। ‘क्रिसमस ट्री’ और सांता क्लॉज के प्रतीक-स्वरूपों पर उज्बेकिस्तान और कजाखस्तान में भी हमले किए गए, लेकिन उन देशों की सभ्यता और संस्कृति भिन्न हैं। भारत सनातन का देश है, लिहाजा धर्मनिरपेक्ष और समभावी है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ हमारा मानसिक दर्शन और आदर्श है, लिहाजा हम किसी भी धर्म, उसके आराध्य और पर्व-आयोजनों पर प्रहारों के पक्षधर नहीं हैं। ये शैतानी हरकतें संविधान और कानून की दृष्टि से भी दंडनीय और निंदनीय हैं। ईसाई समुदाय के 2.4 अरब से अधिक लोग ‘क्रिसमस’ में आस्था रखते हैं और 25 दिसंबर से 6 जनवरी तक प्रभु यीशु मसीह के सम्मान में पर्वनुमा समारोह मनाते हैं। यीशु को ‘ईश्वर का पुत्र’ और उद्धारकर्ता माना जाता रहा है। उन्होंने प्रेम, क्षमा तथा ईश्वर के राज्य के बारे में शिक्षाएं दीं। यीशु को ही ईसाई धर्म का प्रवर्तक एवं केंद्रीय व्यक्तित्व माना जाता है। भारत में छत्तीसगढ़, मप्र, उप्र, राजस्थान और ओडिशा आदि राज्यों में ईसाइयों पर हमले किसने किए, किन मंसूबों के साथ किए, भारत की संस्कृति पर कालिख पोतने के लिए किए? इन सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे, क्योंकि ये अराजक और असामाजिक गुंडे राजनीतिक संरक्षण में पल-बढ़ रहे हैं।
एक तरफ राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी एक पवित्र चर्च में जाते हैं और ईसाइयों की ‘सुबह की प्रार्थना’ में शामिल होते हैं। दूसरी तरफ ईसाइयों की आस्थाओं को खंडित किया जाता है, हमलों के बावजूद प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाती, यह कैसा विरोधाभास और समाज है? क्रिसमस को लेकर ऐसा घमासान, यह कैसा है नया हिंदुस्तान..?
क्या शहर-शहर फैलते और घूमते ये असामाजिक तत्त्व प्रधानमंत्री मोदी का संदेश भी नहीं सुनते और न ही मानते हैं? क्या इन असामाजिक गुंडों के संदर्भ में प्रधानमंत्री भी कमजोर पड़ गए हैं? क्या प्रधानमंत्री ऐसी हिंसाओं के प्रति चेतावनी नहीं देते? हम ऐसा नहीं मानते, क्योंकि खुद प्रधानमंत्री मोदी आस्तीन के इन सांपों पर अपना गुस्सा, अपनी पीड़ा और असहायता सार्वजनिक मंच से बयां कर चुके हैं। तो फिर धार्मिक भावनाएं भड़काने और धार्मिक स्वतंत्रता छीनने के संवैधानिक उल्लंघन के मामले निरंतर सामने क्यों आ रहे हैं? मिजोरम, मेघालय और नागालैंड हमारे ही देश के राज्य हैं, जहां 74-88 फीसदी तक ईसाई आबादी रहती है। केरल में भी 18 फीसदी से अधिक ईसाई हैं। भारत में ईसाई आबादी 3.5 करोड़ के आसपास है, ऐसा अनुमान लगाया जाता है, क्योंकि 2011 के बाद तो जनगणना ही नहीं हुई। ईसाई धर्म भारत का तीसरा सबसे अधिक अनुयायी वाला धर्म है। यहां सवाल हिंसा और सांप्रदायिक हमलों का है। उन्हें कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है और देश के विभिन्न हिस्सों में उसकी मौन स्वीकृति दी जा सकती है? ईसाई धर्म पर धर्मांतरण के भी गंभीर आरोप लगाए जाते रहे हैं। उससे कानूनन निपटेंगे अथवा सामूहिक हमलों के जरिए प्रतिक्रिया दी जाती रहेगी?

Parvatanchal