सवाल: निजी अस्पतालों को मनमानी की छूट क्यों?

सवाल: निजी अस्पतालों को मनमानी की छूट क्यों?
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विनीता शर्मा
रकारी अस्पतालों के मुकाबले निजी अस्पतालों में उपचार करवाना बहुत महंगा होता है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। निजी अस्पतालों के महंगे इलाज को लेकर विभिन्न मंचों पर नाराजगी के स्वर भी सुनाई देते हैं। इसलिए उच्चतम अदालत ने प्राइवेट अस्पतालों में उपचार की दरों के निर्धारण में देरी पर जो नाराजगी जताई है, उसे वाजिब ही कहा जाएगा। ऐसा इसलिए भी कि निजी क्षेत्र के सभी अस्पतालों में जांच व उपचार की अपनी-अपनी दरें हैं। इन दरों में भी काफी अंतर देखने को मिल जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी आपत्ति जताई है कि सरकार चौदह वर्ष पुराने क्लिनिकल स्थापना नियमों को लागू नहीं कर पा रही है।


सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों के पीछे मंशा निश्चित ही आम मरीजों को राहत देने की रही है। किस स्तर पर उपचार में कितना खर्चा होगा, इसका कोई न कोई मापदण्ड तो होना ही चाहिए। अभी तो लगता है जैसे निजी अस्पतालों पर किसी का नियंत्रण ही नहीं है। जांच व उपचार के लिए जिसको जो सही लगा, उसने वही दाम रख दिए। सभी निजी अस्पताल इस मामले में मनमानी कर रहे हों, ऐसा भी नहीं है। लेकिन, ज्यादातर निजी अस्पतालों में सेवाओं के शुल्क की सूची प्रदर्शित नहीं होना भी दर्शाता है कि नीयत नेक नहीं है। मरीज को उपभोक्ता भी माना जाए, तो यह हर उपभोक्ता का हक होता है कि उसे सेवा के बदले अदा की जाने वाली राशि के बारे में पता हो और वह इस आधार पर किसी अस्पताल में इलाज करवाने या न करवाने का फैसला कर सके। भले ही निजी अस्पतालों के संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट की इस व्यवस्था को विनाशकारी करार दिया है, लेकिन हकीकत उनसे भी छिपी नहीं है। इलाज और जांच की दरों को तय करने से अस्पतालों के संचालन का खर्च, जिसमें वेतन-भत्ते भी शामिल हैं, बहुत ज्यादा प्रभावित होगा ऐसा भी नहीं है। विशेषज्ञों को यह तय करना ही चाहिए कि किस जांच व उपचार में कितनी रकम ली जानी चाहिए। जो लोग ये दरें तय करेंगे वे मरीजों के साथ निजी अस्पतालों का भी भला ही चाहेंगे। हां, दरें तय हो जाने पर चिकित्सा सेवाओं को कारोबार बनाते हुए बेतहाशा दाम वसूल रहे अस्पतालों को जरूर फर्क पड़ सकता है।


यह भी ध्यान रहे कि सुप्रीम कोर्ट जो कुछ कह रहा है, उसमें कोई नई बात नहीं है। चौदह साल पहले सभी अस्पतालों को श्रेणियों और ग्रेडिंग में बांटकर दरों का निर्धारण करने और इन्हें अस्पतालों के डिस्प्ले बोर्ड पर लगाने की व्यवस्था की गई थी। इसके बावजूद इस व्यवस्था की अनदेखी की गई। कोरोना में भी न्यायालयों की गाइडलाइन का इसी तरह उल्लंघन हुआ जिससे मरीजों का इलाज करवाने में मुश्किल आई। मरीज के प्रति संवेदना रखना और उसे संबल देना सरकार का दायित्व है। यह सुनिश्चित होना चाहिए कि इलाज के नाम पर कहीं भी मनमानी न हो। यदि किसी अस्पताल में इलाज के नाम पर मनमानी हो रही है, तो उसे रोकना सरकार की ही जिम्मेदारी है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं )

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