स्मरण: पहाड़ की संवेदनाओं के कवि- गीतकार ‘ शेरदा ‘अनपढ़’

स्मरण: पहाड़ की संवेदनाओं के कवि- गीतकार ‘ शेरदा ‘अनपढ़’
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डाॅ हरिश्चंद्र अंडोला
कुमाऊंनी कविताओं के मशहूर कवि  शेरदा ‘अनपढ़’  ने कुमाऊंनी कविताओं को सबसे पहले पहचान दिलाई थी। शेरदा ‘अनपढ़’  के नाम से लोकप्रिय रहे शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ ने आमजन की आकांक्षाओं को बहुत सीमित साधनों में भी कितना उम्मीदों भरा बनाया है, उसे उनकी सुप्रसिद्ध कविता-गीत-….. ‘ओ परूआ बौज्यू चप्पल कै ल्याछा यस/फटफटा नी हूनी चप्पल कै ल्याछा यस’ से समझा जा सकता है। अपनी बहुत छोटी जरूरतों के लिये संषर्घ करते समाज के संकटों को बहुत खूबसूरती और गहरी समझ के साथ रखने का हुनर उनमें था। शेरदा ‘अनपढ़’ का जन्म 13 अक्टूबर 1933 को अल्मोड़ा के माल गांव में हुआ था। शेरदा अनपढ़ थे लेकिन उसके बावजूद भी उनकी कविताओं में वह सब कुछ था जो एक कवि की कविताओं में होता है। उनकी कविताओं में पूरा पहाड़ समाया और यहां का जीवन, यहां का दर्द, यह सभी शेरदा अनपढ़ की कविताओं में आपको पढ़ने को मिलेगा।

   शेर सिंह बिष्ट यानी शेरदा ‘अनपढ़’ के प्रारंभिक जीवन में ही इनके पिता बचे सिंह का देहांत हो गया था। पिता की बीमारी के इलाज के लिए घर और जमीन भी बेचनी पड़ी थी, जिससे इनकी पारिवारिक आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई। पति के गुजर जाने के बाद इनकी मां लछिमा देवी लोगों के खेतों में मजदूरी कर अपने बच्चों का लालन-पालन करती थी। तत्कालीन समय में पहाड़ों में पढ़ाई लिखाई को इतना महत्व नहीं दिया जाता था, जिस कारण शेरदा स्कूल पढ़ने नहीं गए। शेरदा ने कभी स्कूल का मुंह तो नहीं देखा लेकिन एक शिक्षिका ऐसी थी जिनके घर उन्होंने 5 साल की उम्र में पहली नौकरी की और उसी शिक्षिका ने उन्हें प्राथमिक शिक्षा दी। इसी तरह कुछ साल बीतने के बाद शेरदा फौज में भर्ती हो गये।
शेरदा जब फौज में भर्ती हुए तो उन्हें ड्राइवरी का काम मिला और फौज में जब उनका तबादला ग्वालियर हुआ तो वहां उन्हें टीवी की बीमारी हो गई। इसके इलाज के लिए उन्हें पुणे के मिलिट्री अस्पताल में भर्ती कराया गया।  2 साल तक वहां उपचार कराने के दौरान उन्हें 1962 में चीन की लड़ाई में घायल हुए सिपाहियों से मिलने का मौका मिला और उन सिपाहियों की हालत और उनका दर्द देख पहली बार शेरदा ने उन हालातों को कविता में पिरोया। उसके बाद बीमारी के कारण शेर दा अल्मोड़ा लौट आए, यहां चारू चंद्र पांडे और बृजेंद्र लाल शाह के सानिध्य में शेर दा को नया आयाम मिला, जिसके बाद लखनऊ, अल्मोड़ा, नजीबाबाद, रामपुर रेडियो स्टेशनों से शेरदा के गीत और कविताओं का प्रसारण होने लगा। शेरदा ने ‘ये कहानी है नेफा और लद्दाख की, दीदी-बैणी, मेरी लटि -पटि, जाँठिक घुँडुर, हमार मैं-बाप और फचैक आदि कविताएं लिखी हैं। उनका लिखा हुआ साहित्य खजाना हमेशा अमर रहेगा। 20 मई 2012 में उनकी मृत्यु हो गई थी। लोक साहित्य के संरक्षण के लिए प्रयासरत कुछ रचनाकारों ने  शेरदा की पुण्यतिथि पर उन्हें नमन किया है।उत्तराखंड के अल्मोड़ा के माल गांव में 1933 को बचे सिंह बिष्ट के घर जन्मे तथा कुमाऊंनी कविताओं की धरोहर के रूप में विख्यात कुमाऊंनी कवि शेर सिंह बिष्ट शेरदा ‘अनपढ़’ कुमाऊंनी कविताओं के विकास में हमेशा याद रखे जाएंगे। भाषाई महत्ता को अनपढ़ होते हुए भी शेर दा ने जिस तरह अपनी कविताओं में पिरो कर रखा उसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। उन्होंने कुमाउंनी में अपना रचनाकर्म निरंतर  जारी रखा।

    आकाशवाणी ,कैसेट्स के जरिये उन्होंने हास्य व्यंग्य के माध्यम से समाज में चेतना प्रसारित की । वह अस्सी के दशक में पर्वतीय समाज के अकेले चहते कुमाउंनी व्यंगकार रहे जिन्हें शायद मंचों से लेकर रामलीला मेलों और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में सम्मानपूर्वक आमंत्रित किया जाता था।      शेरदा को जीवन की गजब दार्शनिक एवं व्यावहारिक समझ थी।यही उनकी कविताओं का प्राण है और यही कारण है कि उनकी कविताएं कई कालजयी कविताओं के करीब लगती हैं या उनकी याद दिलाती हैं। उनकी ‘तू को छै’ कविता पंत की ‘मौन निमंत्रण’ के बहुत करीब लगती है तो कुछ दूसरी कविताएँ कबीर की रचनाओं की याद दिला देती हैं, जैसे–‘जा चेली जा सौरास’,‘जग–जातुरि’, ‘एक स्वैंण देखनऊँ’, हँसू कि डाड़ मारूँ’ आदि। शेरदा मूलतः हास्य कवि नहीं हैं, हालाँकि हास्य और तीखा व्यंग भी उनकी रचनाओं में बहुत सहज और  स्वाभाविक रूप में आता है। वे मूलतः दार्शनिक कवि हैं, जीवन के गूढ़ार्थों की  व्याख्या वे अत्यंत सहजता से करते हैं। वे एक लाइन कहते थे और पाठक व श्रोता अर्थों में गहरे डूबने लगते थे। इसके बाद यह सिलसिला मंचीय प्रस्तुतियों, गोष्ठियों, परिचर्चाओं से लेकर दूरदर्शन और रेडियो तक पहुँचाजिसने ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले एक सरल इंसान को  अपने एक कवि-कथाकार के रूप में स्थापित किया। शेरदा अनपढ़ को दर्जन भर से अधिक पुरुस्कारों से नवाजा गया, जिसमें कुमाउँनी साहित्य सेवा सम्मान, हिंदी संस्थान से सम्मान, उमेश डोभाल स्मृति सम्मान,प्रमुख हैं। कुमायूँ विश्वविद्यालय में शेरदा की कविताएं पढ़ाई जाती हैं साथ ही उनकी कविताओं व साहित्य पर कई शोध किये जा चुके हैं ।शेरदा ने बड़ा विकट जीवन जिया।घरेलू नौकर से लेकर फौज की नौकरी, फिर बीमारी का दौर और आर्थिक कष्ट, फिर गीत एवं नाटक प्रभाग की नौकरी। इस जीवन यात्रा के अनुभवों ने उन्हें संसार के प्रति कबीर जैसी दृष्टि दी तो कष्टों को काटने-सहने के लिए उन्होंने निपट हास्य का सहारा लिया। इसलिए उनका हास्य भी बनावटी नहीं है और बहुधा उसमें त्रासदियाँ छुपी हुई हैं। पहाड़ के रवींद्रनाथ टैगोर कहे जाने वाले शेरदा, अतुलनीय काव्य प्रतिभा के धनी थे, वो एक मार्मिक कवि थे, जो अपनी हास्य कविताओं द्वारा पहाड़ और वहाँ के जन मानस के मर्म को उकेरता था।

   शेरदा की किताब ‘मेरि लटि पटि’  यूनिवर्सिटी में एमए की पाठ्यपुस्तक में निर्धारित की गयी, तो एकाएक पढ़े-लिखे सभ्य लोगों की दुनिया में मानो भूचाल आ गया। यह बात किसी की भी समझ में नहीं आई कि एक अनपढ़ को पढ़े-लिखे लोगों की जमात का हिस्सा कैसे बनाया जा सकता है ? पहले तो यही बात विश्वास करने लायक नहीं थी कि एमए में किसी कुमाऊंनी कवि को पढ़ाया जाना चाहिए, भाषा या बोली का सैद्धांतिक विवेचन तक तो ठीक, ‘ये कुछ ज्यादा ही नहीं हो गया प्रोफ़ेसर जी?’ ऐसे सवाल मेरे सामने पेश किये जाने लगे. कुछ दिनों बाद, जब शेरदा के साहित्य पर पीएच.डी. और लघुशोध के लिए प्रबंध लिखे जाने लगे, जैसा कि होना ही था, विद्वानों के द्वारा दूसरी भोली जिज्ञासा प्रस्तुत की जाने लगी, ‘डॉ. साब, इतना तो आप खुद ही कर सकते हैं कि ये ‘अनपढ़’ उपनाम हटा दें… जो लेखक बच्चों को एमए, पीएच.डी. की डिग्री दे रहा है, उसे आप ‘अनपढ़’ कह रहे हैं, यह बात कैसे समझ में आ सकती है!  अनपढ़ आदमी पढ़े-लिखों को कैसे पढ़ा सकता है? धीरे-धीरे लोगों की समझ में यह बात आ ही गई कि शेरदा का यह उपनाम मैंने नहीं, उन्होंने खुद ही रखा था। शायद इसके पीछे यह कारण रहा हो कि विश्वविद्यालय के युवा विद्यार्थियों के बीच उनके विद्वान प्रोफेसरों की उपस्थिति के बगैर चर्चाएँ होने लगीं, अनौपचारिक गोष्ठियां आयोजित की जाने लगीं और विद्यार्थी खुद ही ग्रामीणों के पास जाकर ग्रामीण-कुमाउंनी शब्दावली का संकलन करने लगे। उच्च शिक्षा के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हो रहा था जब छात्र-छात्राओं को औपचारिक शिक्षक की जरूरत नहीं रह गई थी। लोगों की समझ में माज़रा नहीं आ रहा था, फिर भी वे भौंचक एक-दूसरे की ओर ताक रहे थे। इतना तो शोध की गंभीर दुनिया के अन्दर कैद जेआर ऐफों, एसआर ऐफों को भी महसूस होने लगा था कि यार, शेरदा के कोर्स में आने के बाद हमारा संपर्क अपनी भूली-बिसरी भाषा और संस्कृति के साथ हो गया है। पढ़ाने का असली मज़ा तो अब ही आ रहा है!.. कई बार लगता है, हमारा विद्यार्थी प्रोफ़ेसर बन गया है और हम उसके छात्र। इसके बाद जीवन के अंतिम वर्षों में वह अपने परिवार के साथ हल्द्वानी में रहने लगे। और आज से 12 वर्ष पूर्व  उन्होंने अंतिम सांस ली। शेरदा ‘अनपढ़’ की पुण्यतिथि पर उन्हें हृदय से नमन !

लेखक दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

(Uttarakhndkesari.in से साभार प्रस्तुत)

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