स्मरण:जलियांवाला बाग कांड की 104 वीं वर्षगांठ पर शहीदों को शत् शत् नमन
अनंत आकाश
आज से 104 वर्ष पहले 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड ने अंग्रेज़ी हुकमरानोंं के क्रूरतम चेहरे को उजागर कर दिया, जब जनरल डायर के नेतृत्व में बैसाखी के दिन हजारों की संख्या में एकत्रित निहत्थी जनता पर गोलीबारी कर उनकी नृशंस हत्या कर दी गई थी। इतिहास में यह घटना जलियांवालाबाग नरसंहार के नाम से कुख्यात है ।
इस सामुहिक हत्याकांड के बाद भी अंग्रेजी हुकमरान नहीं रुके बल्कि बाद को उन्होंने जनता की एकता को तोड़ने के लिये देश में साम्प्रदायिकता को खूब हवा दी। इसके चलते 1924 में कोहाट में भयानक हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। इसके बाद, राष्ट्रीय आंदोलन में साम्प्रदायिक दंगों पर लंबी बहस चली और इन्हें खत्म करने की जरूरत महसूस की जाने लगी थी। कांग्रेसी नेताओं ने हिंदू और मुस्लिम नेताओं के बीच सुलहनामा लिखा कर दंगों को रुकवाने का प्रयत्न किया। इस समस्या के समाधान के लिये क्रांतिकारी आंदोलन ने भी योगदान दिया। इस संदर्भ में एक लेख 1928 के जून में कीर्ति में छपा तथा भगत सिंह व उनके साथियों के विचारों को आगे प्रस्तुत किया जाने लगा। लेख में कहा गया था कि राष्ट्र के संदर्भ में भगत सिंह और उनके साथियों के विचार और भी प्रासंगिक हो गए हैं।
वर्तमान परिदृश्य में यही आभास होता है कि भारतवर्ष की स्थिति सर्वाधिक दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हो गये लगते हैं। अब तो यह देखा जा रहा है कि दूसरे धर्म का होना ही कट्टर शत्रु होना है। लाहौर के ताज़ा दंगों को ही देख लें कि किस प्रकार मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों ने हिन्दुओं व सिखों पर जुल्म ढहाए। मौका मिलते ही सिख समुदाय भी जवाब देने में पीछे नहीं रहा।
ऐसे में हिंदुस्तान का भविष्य अन्धकारमय नजर आता है। ऐसी धर्मांधताओं ने हिंदुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है। अभी पता नहीं ऐसे घातक दंगे भारत का पीछा कब छोड़ेंगे। इस माहौल में कुछ बिरले लोग ही बचे हैं जो इस साम्प्रदायिक बहाव में नहीं बहे हैं। अधिकांश लोग तो इस बहाव में बहकर अपने सम्प्रदाय के इर्दगिर्द ही गोलबन्द होते जा रहे हैं।

जहां तक देखा गया है कि इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं तथा कुछ हद तक सत्ता समर्थक मीडिया का भी हाथ नज़र आता है। जो नेता बड़ी- बड़ी बातें करते थे वे आज या तो चुप हैं,या फिर साम्प्रदायिकता के बहाव में बहते जा रहे हैं।
जो सबका भला चाहते हैं, उनकी संख्या कम है। पत्रकारिता का व्यवसाय जो बहुत ऊंचा माना जाता था ,आज एक दूसरे के विरुद्ध बडे़ – बडे़ शीर्षक छापकर दंगे भड़काने में लगे हुए हैं। ऐसे लेखक बहुत कम हैं , जो माहौल को शांत करने के पक्ष में लगते हैं । अखबारों का सही उद्देश्य लोगों की शिक्षा, ज्ञानवर्द्धन तथा राष्ट्रीय हितों के लिए काम करना है, न कि साम्प्रदायिक राजनीति कर भारत की व्यापक एकता को कमजोर करना । असहयोग आंदोलन की एकता तो सभी को याद होनी चाहिए,, जब नेताओं व पत्रकारों ने भारी कुर्बानियां दी थीं।
अनुभव बताता है कि दंगों का मूल कारण आर्थिक होता है और इसे समाज व देश की आर्थिक दशा सुधार कर ही रोका जा सकता है ऐसे में सरकार को बदलने के प्रयास तेज किये जाने चाहिए। मेहनतकशों के असली दुश्मन पूंजीपति हैं। संसार के सभी गरीबों को सबकुछ भुलाकर सरकार की ताकत अपने हाथ में लेनी चाहिए। हमारी पहचान धार्मिकता नहीं बल्कि हमारी वास्तविक पहचान भारतीयता है । आजादी के काफी वर्षों बाद भी कमोबेश आज हम उसी मुकाम पर आ खड़े हैं,जहाँ साम्प्रदायिक आधार पर भारी विभाजन तथा पूंजीवाद का नंगा स्वरूप आमजन के सामने है। इन्हीं कारणों से आज हम त्रस्त हैं, इसलिए हमें साम्प्रदायिकता एवं कारपोरेटपरस्त नीतियों के खिलाफ एकजुटता के साथ संघर्ष करते हुए साम्प्रदायिक सौहार्द तथा सभी के लिये प्रगति का रास्ता प्रशस्त करना होगा। और यही आज के दिन जलियांवाला बाग के शहीदों के प्रति हमारी सच्ची श्रृद्धांजलि होगी। इसी आधार पर शहीदे आजम भगतसिंह एवं तमाम क्रांतिकारियों के स्वप्न साकार होंगे ।
(यहां व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)

