विरोध: समान नागरिकता संहिता बिल के खिलाफ डीएम के माध्यम से राष्ट्रपति को भेजा ज्ञापन
वामपंथी दलों व विभिन्न जन संगठनों ने बिल को बताया भेदभावपूर्ण, अन्यायपूर्ण व विभाजनकारी
देहरादून। राष्ट्रपति द्वारा मंजूर उत्तराखंड समान नागरिकता (U C C) बिल का वामपंथी दलों व जन सरोकारों से जुड़े सामाजिक संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया है। उन्होंने बिल को अन्यायपूर्ण,
भेदभावपूर्ण व विभाजनकारी बताया है। गुरुवार को यूसीसी बिल के खिलाफ वामपंथी दलों सीपीएम, सीपीआई (एमएल), आयूपी, चेतना आन्दोलन, सीआईटीयू , एआईएलयू , नेताजी संघर्ष समिति व किसान सभा के प्रतिनिधि देहरादून में जिलाधिकारी कार्यालय पर पहुंचे तथा जिलाधिकारी के माध्यम से राष्ट्रपति को ज्ञापन प्रेषित किया। डीएम की अनुपस्थिति में जिला भूमि अध्याप्ति अधिकारी स्मृति परमार ने ज्ञापन लिया। उन्होंने आवश्यक कार्यवाही का आश्वासन दिया ।
प्रदर्शन में सीपीआई (माले ) के प्रदेश महामंत्री इन्द्रेश मैखुरी, सीपीआई (एम) के जिलासचिव राजेन्द्र पुरोहित, देहरादून सचिव अनन्त आकाश, आयूपी के अध्यक्ष नवनीत गुंसाई ,चेतना आन्दोलन के शंकर गोपाल, किसान सभा के कमरूद्दीन, माला गुरूंग, आल इण्डिया लायर्स यूनियन (एआईएलयू) के एडवोकेट शम्भूप्रसाद ममगाई ,अब्दुल राऊत,अनुराधा सिंह, सीआईटीयू के किशन गुनियाल, भगवन्त पयाल, रविन्द्र नौडियाल, गुरूप्रसाद पेटवाल व महेन्द्र राय आदि शामिल थे ।
ज्ञापन इस प्रकार है-
प्रति,
महामहिम राष्ट्रपति महोदया,
भारत गणराज्य, नयी दिल्ली
द्वारा : जिलाधिकारी महोदया, देहरादून.
महामहिम,
केंद्र सरकार द्वारा नागरिकता संशोधन अधिनियम ( सीएए) की नियमवाली की अधिसूचना जारी कर दी गयी है.
दिसम्बर 2019 में पास किये गये भेदभावकारी और विभाजनकारी अन्यायपूर्ण नागरिकता संशोधन कानून को लागू करने वाली नियमावली की अधिसूचना 2024 चुनावों की अधिसूचना आने से ठीक पहले जारी करना एक राजनीतिक साजिश का संकेत है.
महामहिम, केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने खुद सीएए की ‘क्रोनोलॉजी’ समझाते हुए कहा था कि इस कानून को लागू करने के बाद एनआरसी—एनपीआर को देशव्यापी स्तर पर लाया जायेगा जिसके माध्यम से दस्तावेज न दिखा पाने वाले नागरिकों को नागरिकता के अधिकार से वंचित कर दिया जायेगा. सीएए नागरिकों को धर्म के आधार पर बांटने के मकसद से लाया गया है, जो भ्रामक रूप से गैरमुस्लिम ‘शरणार्थियों’ को नागरिकता देने और मुसलमानों की नागरिकता छीनने, यहां तक कि देशनिकाला देने, तक की बात करता है. लेकिन असम में की गयी एनआरसी की कवायद और देश में जगह—जगह चलाये जा रहे बुलडोजर ध्वस्तीकरण अभियानों से स्पष्ट हो चुका है कि आदिवासियों और वनवासियों समेत सभी समुदायों के गरीब इससे प्रभावित होंगे.
देश का लोकतांत्रिक अभिमत और समान नागरिकता एवं संवैधानिक अधिकार आन्दोलन ने सीएए—एनआरसी के पूरे पैकेज को संविधान पर हमला बता कर खारिज कर दिया है.
महामहिम, भारत संवैधानिक रूप से एक धर्मनिरपेक्ष देश है.1955 के नागरिकता अधिनियम में भारत का नागरिक होने के लिए धर्म का कहीं जिक्र नहीं था. लेकिन सीएए के जरिये नागरिकता को धर्म से जोड़ा जा रहा है. यह पूरी तरह से आलोकतांत्रिक और संविधान विरोधी है. देश से बाहर के कुछ धर्मों के उत्पीड़ितों को नागरिकता देने के घोषित उद्देश्य से अधिक यह देश में धर्म विशेष के नागरिकों को उत्पीड़ित करने का औज़ार बनेगा.
अतः हम न केवल सीएए और उसकी हाल में अधिसूचित नियमवाली को बल्कि आगे आने वाले पूरे पैकेज यानि सीएए-एनआरसी-एनपीआर को भी खारिज किए जाने की मांग करते हैं.

