यौन उत्पीड़न मामला: तरुण तेजपाल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, सजा के खिलाफ अपील
नई दिल्ली (आरएनएस)। सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को तहलका पत्रिका के पूर्व प्रधान संपादक तरुण तेजपाल की याचिका पर नोटिस जारी किया। तेजपाल ने वर्ष 2013 के यौन उत्पीड़न मामले में बंबई उच्च न्यायालय की गोवा पीठ के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें दोषी ठहराते हुए 10 साल के कारावास की सजा सुनाई गई है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने की। तेजपाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल पेश हुए, जबकि गोवा सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा।
संक्षिप्त सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने कहा कि उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के बरी किए जाने के फैसले को पलट दिया है। उन्होंने पीठ से कहा कि यह उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने का मामला है और उनके मुवक्किल को अपील करने का अधिकार है। सिब्बल ने यह भी बताया कि तेजपाल ने आत्मसमर्पण कर दिया है।
इस पर पीठ ने तेजपाल की याचिका पर नोटिस जारी करने पर सहमति जताई। सिब्बल ने सजा पर रोक लगाने संबंधी अर्जी की सुनवाई के लिए शीघ्र तारीख तय करने का अनुरोध किया। न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा कि इस अनुरोध पर विचार किया जाएगा।
इससे पहले छह अगस्त को बंबई उच्च न्यायालय की गोवा पीठ के न्यायमूर्ति नीला गोखले और न्यायमूर्ति अमित जमसांडेकर ने तेजपाल को दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था। हालांकि, उनके वकीलों के अनुरोध पर अदालत ने आत्मसमर्पण के लिए दी गई अवधि बढ़ाकर चार सप्ताह कर दी थी।
उच्च न्यायालय ने तेजपाल को न्यूनतम सजा देने के पीछे घटना को 13 वर्ष पुराना होना और उसके बाद उनके द्वारा किसी अन्य अपराध में शामिल नहीं होने जैसे पहलुओं का उल्लेख किया था। अदालत ने यह भी कहा था कि पीड़िता और तेजपाल, दोनों अब अपने जीवन में आगे बढ़ चुके होंगे।
उच्च न्यायालय ने तेजपाल पर 10 लाख 21 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। अदालत ने निर्देश दिया कि जुर्माने की पूरी राशि यौन उत्पीड़न की पीड़िता को दी जाएगी।
तेजपाल ने सजा में नरमी की मांग करते हुए खुद को राजनीतिक प्रतिशोध का शिकार बताया था और अपने दो बेटियों के पिता होने का भी उल्लेख किया था। वहीं, गोवा सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अधिकतम सजा दिए जाने की मांग की। उन्होंने कहा कि इससे यह स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि सहमति के बिना किसी भी यौन संबंध की अनुमति नहीं है और ‘नहीं’ का अर्थ ‘नहीं’ होता है।
बंबई उच्च न्यायालय ने मामले में निचली अदालत के बरी करने के आदेश को रद्द करते हुए तेजपाल को दोषी ठहराया था। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि निचली अदालत के बरी करने के फैसले को रद्द किया जाता है और तेजपाल दोषी हैं। इसके बाद तेजपाल ने उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात कही थी।
तेजपाल को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया है। इनमें धारा 376(2)(एफ) के तहत विश्वास या अधिकार की स्थिति में मौजूद व्यक्ति द्वारा बलात्कार, धारा 354(ए) के तहत यौन उत्पीड़न और धारा 354(बी) के तहत किसी महिला को निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का इस्तेमाल करने के अपराध शामिल हैं। धारा 376(2)(एफ) के तहत अधिकतम सजा आजीवन कारावास का प्रावधान है।

