मुद्दा: क्या सचमुच चुनाव आयोग संविधान से भी ऊपर और निरंकुश है?
असम, केरलम, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और संघशासित क्षेत्र पुडुचेरी में चुनावों की घोषणा एक असमंजस, संकट और गहरे सवालों के साथ की गई है। इन चार राज्यों और संघशासित क्षेत्र में कुल 17.4 करोड़ मतदाता अपने संवैधानिक मताधिकार का इस्तेमाल कर सरकारें चुनेंगे, लेकिन यह पहली बार हो रहा है कि 1 करोड़ 65 लाख से अधिक मतदाताओं का मताधिकार ही छीन लिया गया है। चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद इतने मतदाताओं के नाम काट दिए गए हैं। क्या वे सभी घुसपैठिए बांग्लादेशी या रोहिंग्या थे? चुनाव आयोग इस सवाल पर स्पष्टीकरण नहीं देता। सबसे संवेदनशील और एक हद तक असंवैधानिक मामला पश्चिम बंगाल का है। वहां एसआईआर के तहत 63.66 लाख मतदाताओं के नाम काट दिए गए थे, लेकिन बाद में 10 लाख से अधिक मतदाताओं के दावे सही पाए गए, लिहाजा उन्हें मतदाता-सूची में शामिल कर लिया गया। अब भी 50 लाख से अधिक मतदाताओं की जांच जारी है, न्यायिक अधिकारी जांच कर रहे हैं और इसी बीच चुनावों की घोषणा कर दी गई। क्या ये 50 लाख से अधिक मतदाता वोट नहीं दे पाएंगे? क्या इतने व्यापक स्तर पर मताधिकार से वंचित कर चुनाव कराए जा सकते हैं? यह जांच कोलकाता उच्च न्यायालय की निगरानी में जारी है। बंगाल का यह मामला सर्वाेच्च अदालत में भी उठ चुका है, लेकिन कोई स्पष्ट जवाब नहीं है कि इतने वोटों को काट देना क्या असंवैधानिक नहीं है? मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की दलील थी कि जो मतदाता जांच के दायरे में हैं और अभी उनके नाम मतदाता-सूची में दर्ज नहीं हैं, कमोबेश उन्हें विधानसभा चुनाव में वोट देने का अधिकार बहाल रखा जाए, लेकिन चुनाव आयोग नहीं माना। नतीजतन बंगाल में 50 लाख से अधिक मतदाता इस चुनाव में वोट नहीं दे सकेंगे।
क्या भारत का लोकतंत्र और संविधान इसीलिए ‘महान’ हैं? क्या चुनाव आयोग संविधान से भी ऊपर और निरंकुश है? यदि संदिग्ध मतदाता जांच के बाद सही पाए गए और चुनाव भी सम्पन्न हो गए और वे मताधिकार से वंचित रहे, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? क्या मुख्य चुुनाव आयुक्त और दोनों आयुक्त बर्खास्त किए जा सकते हैं? कदापि नहीं, क्योंकि संविधान में सिर्फ महाभियोग के जरिए ही इन आयुक्तों को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों ने हस्ताक्षर कर महाभियोग के नोटिस दे रखे हैं, लेकिन ज्ञानेश को नैतिकता की कोई चिंता नहीं है। वह राजनीतिक सवालों पर टिप्पणी भी नहीं करते और मीडिया के सवालों के जवाब भी नहीं देते। क्या वह अति-संवैधानिक अधिकारी हैं? आश्चर्य तो यह है कि इतने व्यापक स्तर पर मताधिकार छीनने का काम किया गया है और सर्वाेच्च अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती। क्या उसकी यही संविधान-संरक्षक की भूमिका है?
बंगाल ही नहीं, एक और मामला बेहद महत्वपूर्ण और संविधान पर सवालिया है। केरलम के करीब 40 लाख नागरिक खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं। तमिलनाडु के भी 11 लाख से अधिक नागरिक खाड़ी देशों में हैं। वे अब भी भारतीय नागरिक हैं। उनका पासपोर्ट और अन्य दस्तावेज भी भारतीय हैं। वे औसतन 50-51 अरब डॉलर भारत में अपने ‘घरों’ को भेजते हैं। यह धन भारतीय बैंकों में आता है, लिहाजा भारत की जीडीपी को भी बढ़ाता है। क्या चुनाव आयोग ने मतदाता-सूची शुद्धिकरण में इन 51 लाख से अधिक भारतीयों को भी ‘वोटर’ माना है? इसका भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। असम को छोड़ कर सभी राज्यों में एसआईआर का अभियान सम्पन्न हो चुका है। अधिकांश अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी नाम काटे गए हैं। प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा ने घुसपैठियों के जरिए जनसांख्यिकी बदलाव पर गहरी चिंता व्यक्त की है। बहरहाल, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और तटस्थता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

