मुद्दा: क्या सचमुच अगले दशक में एआई से मानव का सर्वनाश हो सकता है ?
अमेरिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) कंपनियों से हाल में हुए इस्तीफों ने मानव समुदाय के समने मौजूद एक गहरे संकट पर रोशनी डाली है। एआई की दो बड़ी कंपनियों- ओपन एआई और एंथ्रोपिक में काम करने के बाद 27 वर्षीय रिसर्चर जैकब कॉक्सन ने एंथ्रोपिक से यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि ये कंपनियां एआई मॉडल्स को उस अवस्था में पहुंचाने पर आमादा हैं, जब वो मानव नियंत्रण से बाहर हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि सुपरइंटेलिजेंस की ओर यह दौड़ किसी एक कंपनी की घटना नहीं, बल्कि पूरे एआई उद्योग की नैतिक विफलता का प्रतीक बन गया है। कॉक्सन के बयान के बाद एआई उद्योग में काम कर चुके कई अन्य विशेषज्ञ भी सामने आए। उन्होंने बताया कि ऐसी ही चिंताओं के कारण उन्होंने भी नौकरी छोड़ी।
एंथ्रोपिक के वर्तमान कर्मचारी इवान हुबिंगर ने यह कहकर सनसनी फैला दी है कि उन्हें यह संभावना 10 प्रतिशत से अधिक लगती है कि अगले दशक में एआई से मानव का सर्वनाश हो सकता है। इन बयानों से सवाल उठा है कि जब एआई विकसित करने में जुटे विशेषज्ञ मानते हैं कि उनका उत्पाद मानवता के लिए घातक हो सकता है, तो कंपनियां इसे क्यों विकसित कर रही हैं? एंथ्रोपिक के शोधकर्ता सैमुअल मार्क्स ने कहा है कि इसके पीछे कारण अरबों डॉलर के निवेश से पैदा दबाव और यह भय है कि कहीं कोई दूसरी कंपनी आगे ना निकल जाए। यह अच्छी बात है कि इस चर्चा से अमेरिकी राजनेताओं का एक हिस्सा चिंतित हुआ है।
एआई के संचालन को विनियमित करने के लिए विधेयक लाने का इरादा उन्होंने जताया है। हालांकि डॉनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति रहते ऐसे किसी प्रयास का सफल होना आसान नहीं है, फिर भी उभरी सार्वजनिक चिंता आशाजनक संकेत है। इस सिलसिले में चीन में हुई पहल पर भी गौर करना चाहिए, जहां बीते जुलाई में वर्ल्ड एआई सम्मेलन के दौरान एआई के वैश्विक संचालन संबंधी कुछ महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए गए। अब ऐसी तमम कोशिशों के बीच तालमेल बनाना जरूरी हो गया है। तभी नई तकनीक को मानव विवेक के अधीन रखने की कारगर व्यवस्था अस्तित्व में आ सकेगी।

